India’s Double Monsoon: Know the Timing and Impact of Northeast Monsoon
अगले माह फिर दस्तक देने वाला है मानसून
देहरादून, 28 सितंबर 2025 : चौंक गए ! लेकिन यह है एकदम सच। हालांकि देश के एक बडे भाग पर कहर बरपाने के बाद ज्यादातर राज्यों से दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई हो रही है। उत्तराखंड से मानसून की वापसी के बाद मैदानों में पारा भी उछाल मारने लगा है। शनिवार को देहरादून का अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया, जो सामान्य से पांच डिग्री अधिक है और बीते 10 वर्ष में यह चौथा मौका है जब पारे ने 35 डिग्री की ऊंचाई को छुआ है। खैर, इस जानकारी के बाद मुददे की बात यह है कि अक्टूबर में देश में मानसून फिर दस्तक देने वाला है।
शायद कम लोगों को पता हो कि भारत में मानसून वर्ष में दो बार सक्रिय होता है। जिस मानसून से हम परिचित हैं, उसे कहते हैं दक्षिण-पश्चिम मानसून। यह मुख्यत: जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है और मुख्य रूप से अरब सागर में बनता है। यहां से दक्षिण-पश्चिमी हवाएं नमी ग्रहण करके भारत की ओर बढ़ती हैं। इसके बाद यह दो शाखाओं में विभाजित होता है। पहली अरब सागर शाखा जो पश्चिमी भारत को प्रभावित करती है और बंगाल की खाड़ी शाखा जो पूर्वी भारत पर असर डालती है, लेकिन इसकी उत्पत्ति और नमी का स्रोत अरब सागर ही है।
इसके अलावा अक्टूबर से दिसंबर तक उत्तर पूर्वी मानसून (Northeast Monsoon) सक्रिय होता है। यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत के पूर्वी तट, जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और श्रीलंका के कुछ हिस्सों को प्रभावित करता है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच उत्तर पूर्वी व्यापारिक हवाएं (Trade Wind) भूमि से समुद्र की ओर बहकर नमी ग्रहण करती हैं। यह मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी में बनता है, जहां उत्तर-पूर्वी हवाएं ठंडी और शुष्क होती हैं, जो भूमि से आती हैं और बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करके दक्षिण-पूर्वी भारत में वर्षा लाती हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार आमतौर उत्तर पूर्वी मानसून देश में 20 अक्टूबर को प्रवेश करता है, लेकिन पिछले वर्ष यह समय से पांच दिन पहले 15 अक्टूबर को ही पहुंच गया था। मानसून की यह जल्दबाजी पिछले 20 वर्ष में पहली बार देखने को मिली।
क्या है मानसून
मानसून अरबी शब्द ‘मौसिम’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘मौसम’ (Season) या ‘समय’ (Time)। हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल विशेष रूप से उन हवाओं के लिए किया जाता था जो हिंद महासागर और अरब सागर में छह महीने तक एक दिशा और अगले छह महीने दूसरी दिशा में बहती थीं। विज्ञान की भाषा में यह मौसमी हवा का एक बदलाव है, जो गर्मियों में समुद्र से जमीन की ओर बहती है और साथ में भारी बारिश लाती है। यह हवा गर्म जमीन और ठंडे समुद्र के बीच दबाव के अंतर से बनती है। गर्मियों में भारत की जमीन ज्यादा गर्म हो जाती है, जिससे कम दबाव बनता है और समुद्र से नम हवाएं आती हैं। हर बार यह पूरी प्रक्रिया निर्धारित समय में शुरू और संपन्न होती है।
व्यापारिक हवाएं (Trade Winds)
व्यापारिक हवाएं पृथ्वी के भूमध्य रेखा (equator) के दोनों ओर बहने वाली स्थायी हवाएं हैं। ये हवाएं पृथ्वी के घूमने के कारण उत्पन्न होती हैं और पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। ऐतिहासिक रूप से, इन हवाओं का इस्तेमाल व्यापारिक जहाजों द्वारा समुद्री यात्रा के लिए किया जाता था, इसलिए इन्हें व्यापारिक हवाएं कहा जाता है। ये हवाएं महासागरों में सतह के पानी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अल नीनो और ला नीना की घटनाएं इन्हीं हवाओं की शक्ति में बदलाव से जुड़ी हैं। जब ये हवाएं कमजोर होती हैं तो अल नीनो बनता है और जब ये मजबूत होती हैं, तो ला नीना बनता है।
