महिलाओं की आत्मनिर्भरता को नई उड़ान, मुख्यमंत्री ने एकल महिला स्वरोजगार योजना के दूसरे चरण की शुरुआत

    Dehradun, 22 july 2026। उत्तराखंड में महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को ‘मुख्यमंत्री एकल महिला स्वरोजगार योजना’ के दूसरे चरण का शुभारंभ करते हुए 488 एकल महिलाओं के खातों में डीबीटी के माध्यम से 2 करोड़ 76 लाख

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पुशोला बने उत्तराखंड न्यूज़ कैमरामैन्स एसोसिएशन के अध्यक्ष, मुकेश राजपूत सचिव चुने गए

Dehradun, 22 july 2026। उत्तराखंड न्यूज़ कैमरामैन्स एसोसिएशन (यूएनसीए) की देहरादून में आयोजित आम सभा में संस्था को पुनः सक्रिय करने का निर्णय लिया गया। बैठक में सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी का गठन किया गया, जिसमें वरिष्ठ कैमरामैन राजू पुशोला को अध्यक्ष और मुकेश राजपूत को सचिव चुना गया। नई कार्यकारिणी में जितेन्द्र पेटवाल को उपाध्यक्ष, कैलाश कंडवाल को कोषाध्यक्ष

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हरिद्वार में स्थायी भीड़ प्रबंधन के लिए 235 करोड़ की परियोजनाओं का शुभारंभ

Haridwar,21 july 2026। हरिद्वार में महाकुंभ-2027 और सालभर आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ को व्यवस्थित ढंग से संभालने के लिए अब स्थायी आधारभूत ढांचा तैयार किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को हरिद्वार-ऋषिकेश गंगा कॉरिडोर के तहत करीब 235 करोड़ रुपये की चार प्रमुख परियोजनाओं का भूमि पूजन और शिलान्यास किया। इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य भीड़

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पहचान छिपाकर दोस्ती और दुष्कर्म करने वाला युवक गिरफ्तार, हिंदूवादी संगठनों का प्रदर्शन

चमोली: पहचान छिपाकर किशोरी से दोस्ती कर दुष्कर्म करने के आरोपित मुस्लिम युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मामला सामने आने पर गुरुवार को हिंदूवादी संगठन भड़क गए। हिंदू

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ओडिशा के रघुराजपुर में भी  दिखी कुमाऊं की सांस्कृतिक आत्मा, पट्टाचित्र में झलकी ‘ऐपण’ 

Raghurajpur Pattachitra Art Shows Kumaon Aipan Cultural Link पुरी (ओडिशा), 29 March 2026 । भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच एक अद्भुत एकता की झलक ओडिशा के रघुराजपुर गांव में देखने को मिलती है, जहां उत्तराखंड की पारंपरिक ‘ऐपण’ कला की छाप साफ नजर आती है। देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज के रूप में स्थापित यह गांव न केवल अपनी प्राचीन पट्टाचित्र कला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह इस बात का भी जीवंत उदाहरण है कि भारत की लोक कलाएं भौगोलिक दूरियों के बावजूद एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पुरी जिले में स्थित यह छोटा सा गांव मानो एक खुली कला दीर्घा (ओपन एयर आर्ट गैलरी) है। यहां प्रवेश करते ही हर घर की दीवारों पर उकेरे गए रंग-बिरंगे म्यूरल्स, पारंपरिक आकृतियां और धार्मिक चित्र आंखों को आकर्षित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा गांव ही एक जीवित संग्रहालय हो, जहां कला केवल दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। भुवनेश्वर से लगभग 55 किलोमीटर और पुरी से करीब 15 किलोमीटर दूर भार्गवी नदी के किनारे बसे इस गांव में लगभग 160 परिवार रहते हैं, और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में कला से जुड़ा हुआ है। यहां कला केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख साधन भी है। पट्टाचित्र और ऐपण: दो संस्कृतियां, एक भाव रघुराजपुर की सबसे बड़ी पहचान ‘पट्टाचित्र’ कला है, जिसमें कपड़े या ताड़पत्र पर प्राकृतिक रंगों से भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण, रामायण और महाभारत के प्रसंगों को उकेरा जाता है। यह शैली काफी हद तक उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की ‘ऐपण’ कला से मेल खाती है, जहां गेरू और चावल के घोल से शुभ प्रतीक, ज्यामितीय आकृतियां और धार्मिक चिह्न बनाए जाते हैं। दोनों ही कलाओं की खासियत उनकी सूक्ष्म रेखाएं, प्रतीकात्मकता और धार्मिक आस्था से जुड़ाव है। यही कारण है कि रघुराजपुर पहुंचने पर कई बार ऐसा महसूस होता है मानो हम कुमाऊं के किसी पारंपरिक गांव में पहुंच गए हों। कला ही जीवन, कला ही पहचान रघुराजपुर में कला केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के लोगों की जीवनशैली में रची-बसी है। घरों की दीवारों से लेकर आंगन तक, हर जगह कला का स्पर्श दिखाई देता है। यहां के बच्चे बचपन से ही गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कला सीखते हैं और इसे आगे बढ़ाते हैं। गांव ने देश को कई महान कलाकार दिए हैं, जिनमें डा. जगन्नाथ महापात्रा (पट्टाचित्र कला), केलुचरण मोहापात्रा और मगुनी चरण दास (ओडिसी नृत्य) प्रमुख हैं। गांव में इनकी स्मृति में स्थापित मूर्तियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। यह गांव जगन्नाथ मंदिर से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां रथ यात्रा में उपयोग होने वाले पारंपरिक ‘पटास’ (कपड़े) बनाए जाते हैं, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाते हैं। विविध शिल्पों का संगम रघुराजपुर केवल पट्टाचित्र तक सीमित नहीं है। यहां ताड़पत्र उत्कीर्णन, लकड़ी और पत्थर की नक्काशी, पपीयर माशे शिल्प, तुसार चित्रकारी, और पारंपरिक ‘गंजापा’ ताश बनाने जैसी कई विधाएं भी प्रचलित हैं। इन सभी कलाओं में स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो इन्हें और भी विशिष्ट बनाता है। पर्यटकों के लिए सीखने का केंद्र यह गांव केवल दर्शनीय स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रशिक्षण केंद्र भी है। पर्यटक यहां कलाकारों को काम करते हुए देख सकते हैं, उनसे बातचीत कर सकते हैं और स्वयं भी इन कलाओं को सीख सकते हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला ‘रघुराजपुर उत्सव’ इस सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का काम करता है। अध्ययन दल ने किया अवलोकन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से प्रेस सूचना ब्यूरो के सहायक निदेशक के नेतृत्व में उत्तराखंड से आए 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने भी इस धरोहर गांव का भ्रमण किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने न केवल यहां की कलाओं को करीब से देखा, बल्कि कलाकारों से संवाद कर उनकी जीवनशैली और परंपराओं को भी समझा। आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल रघुराजपुर आज इस बात का उदाहरण बन चुका है कि यदि पारंपरिक कला को सही दिशा और मंच मिले, तो वह रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। इसी तरह उत्तराखंड की ‘ऐपण’ कला भी आज महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका का बड़ा माध्यम बनती जा रही है। रघुराजपुर और कुमाऊं की कला के बीच यह समानता भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है—जहां परंपराएं भले अलग हों, लेकिन उनकी आत्मा एक ही है।

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