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Pithoragarh, 25 October 2026: सीमांत जिले पिथौरागढ़ में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। चंडाक स्थित बाबू जगजीवन राम मेडिकल कॉलेज में इसी शैक्षणिक सत्र से एमबीबीएस की 50 सीटों पर प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को मेडिकल कॉलेज का स्थलीय निरीक्षण कर निर्माण…
Dehradun, 25 October 2026। उत्तराखंड के टिहरी जिले में हेंवल नदी को पुनर्जीवित करने की पहल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस मॉडल का उल्लेख किया। पहाड़ों में घटते जलप्रवाह और सूखते प्राकृतिक जलस्रोतों के बीच हेंवल नदी पुनर्जीवन अभियान जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और…
Dehradun, 25 October 2026 । उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहसिक पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित करने के लिए सरकार अगले वर्ष मई के प्रथम सप्ताह में ‘100 माइल्स हिमालयन एंड्योरेंस अल्ट्रा रन’ आयोजित करेगी। करीब 5600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माणा पास से शुरू होने वाली यह दौड़ बदरीनाथ और जोशीमठ होते हुए औली…
अमेरिका और सहयोगी देशों के अनुसार, उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन…
Pithoragarh, 25 October 2026: सीमांत जिले पिथौरागढ़ में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य…
Dehradun, 25 October 2026। उत्तराखंड के टिहरी जिले में हेंवल नदी को…
Dehradun, 25 October 2026 । उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय…
ट्रक में 38 कांवडिए थे सवार, गंगोत्री से जा रहे थे हरिद्वार टिहरी : टिहरी जिले में चंबा- कंडीसौड मार्ग संकरी के पास कांवड़ियों का ट्रक सड़क पर पलट गया।हादसे…
Raghurajpur Pattachitra Art Shows Kumaon Aipan Cultural Link पुरी (ओडिशा), 29 March 2026 । भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच एक अद्भुत एकता की झलक ओडिशा के रघुराजपुर गांव में देखने को मिलती है, जहां उत्तराखंड की पारंपरिक ‘ऐपण’ कला की छाप साफ नजर आती है। देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज के रूप में स्थापित यह गांव न केवल अपनी प्राचीन पट्टाचित्र कला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह इस बात का भी जीवंत उदाहरण है कि भारत की लोक कलाएं भौगोलिक दूरियों के बावजूद एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पुरी जिले में स्थित यह छोटा सा गांव मानो एक खुली कला दीर्घा (ओपन एयर आर्ट गैलरी) है। यहां प्रवेश करते ही हर घर की दीवारों पर उकेरे गए रंग-बिरंगे म्यूरल्स, पारंपरिक आकृतियां और धार्मिक चित्र आंखों को आकर्षित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा गांव ही एक जीवित संग्रहालय हो, जहां कला केवल दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। भुवनेश्वर से लगभग 55 किलोमीटर और पुरी से करीब 15 किलोमीटर दूर भार्गवी नदी के किनारे बसे इस गांव में लगभग 160 परिवार रहते हैं, और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में कला से जुड़ा हुआ है। यहां कला केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख साधन भी है। पट्टाचित्र और ऐपण: दो संस्कृतियां, एक भाव रघुराजपुर की सबसे बड़ी पहचान ‘पट्टाचित्र’ कला है, जिसमें कपड़े या ताड़पत्र पर प्राकृतिक रंगों से भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण, रामायण और महाभारत के प्रसंगों को उकेरा जाता है। यह शैली काफी हद तक उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की ‘ऐपण’ कला से मेल खाती है, जहां गेरू और चावल के घोल से शुभ प्रतीक, ज्यामितीय आकृतियां और धार्मिक चिह्न बनाए जाते हैं। दोनों ही कलाओं की खासियत उनकी सूक्ष्म रेखाएं, प्रतीकात्मकता और धार्मिक आस्था से जुड़ाव है। यही कारण है कि रघुराजपुर पहुंचने पर कई बार ऐसा महसूस होता है मानो हम कुमाऊं के किसी पारंपरिक गांव में पहुंच गए हों। कला ही जीवन, कला ही पहचान रघुराजपुर में कला केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के लोगों की जीवनशैली में रची-बसी है। घरों की दीवारों से लेकर आंगन तक, हर जगह कला का स्पर्श दिखाई देता है। यहां के बच्चे बचपन से ही गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कला सीखते हैं और इसे आगे बढ़ाते हैं। गांव ने देश को कई महान कलाकार दिए हैं, जिनमें डा. जगन्नाथ महापात्रा (पट्टाचित्र कला), केलुचरण मोहापात्रा और मगुनी चरण दास (ओडिसी नृत्य) प्रमुख हैं। गांव में इनकी स्मृति में स्थापित मूर्तियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। यह गांव जगन्नाथ मंदिर से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां रथ यात्रा में उपयोग होने वाले पारंपरिक ‘पटास’ (कपड़े) बनाए जाते हैं, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाते हैं। विविध शिल्पों का संगम रघुराजपुर केवल पट्टाचित्र तक सीमित नहीं है। यहां ताड़पत्र उत्कीर्णन, लकड़ी और पत्थर की नक्काशी, पपीयर माशे शिल्प, तुसार चित्रकारी, और पारंपरिक ‘गंजापा’ ताश बनाने जैसी कई विधाएं भी प्रचलित हैं। इन सभी कलाओं में स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो इन्हें और भी विशिष्ट बनाता है। पर्यटकों के लिए सीखने का केंद्र यह गांव केवल दर्शनीय स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रशिक्षण केंद्र भी है। पर्यटक यहां कलाकारों को काम करते हुए देख सकते हैं, उनसे बातचीत कर सकते हैं और स्वयं भी इन कलाओं को सीख सकते हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला ‘रघुराजपुर उत्सव’ इस सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का काम करता है। अध्ययन दल ने किया अवलोकन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से प्रेस सूचना ब्यूरो के सहायक निदेशक के नेतृत्व में उत्तराखंड से आए 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने भी इस धरोहर गांव का भ्रमण किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने न केवल यहां की कलाओं को करीब से देखा, बल्कि कलाकारों से संवाद कर उनकी जीवनशैली और परंपराओं को भी समझा। आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल रघुराजपुर आज इस बात का उदाहरण बन चुका है कि यदि पारंपरिक कला को सही दिशा और मंच मिले, तो वह रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। इसी तरह उत्तराखंड की ‘ऐपण’ कला भी आज महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका का बड़ा माध्यम बनती जा रही है। रघुराजपुर और कुमाऊं की कला के बीच यह समानता भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है—जहां परंपराएं भले अलग हों, लेकिन उनकी आत्मा एक ही है।
New Delhi: Surprised by the headline? But it’s absolutely true. The central government has introduced a scheme to promote employment generation. The name of the scheme is "Pradhan Mantri Viksit…
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