उत्तराखंड के डिजिटल ब्रांड एंबेसेडर बनें युवा: धामी

Dehradun, 04 October 2026। उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, पर्यटन विकास और स्थानीय स्वरोजगार की पहल हरियाणा से आए युवाओं को प्रभावित कर गई। तीन दिवसीय भ्रमण पर उत्तराखंड पहुंचे युवाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सीएम आवास में मुलाकात कर अपने अनुभव साझा किए। मुख्यमंत्री ने युवाओं से उत्तराखंड की विकास यात्रा, स्थानीय उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत को देशभर…

Web Editor Web Editor

चार माह में भी चिन्हित नहीं हो पाया एक गांव

चार माह में भी चिन्हित नहीं हो पाया एक गांव स्वैच्छिक चकबंदी नीति पर भारी पड़ रही प्रशासनिक सुस्ती 11 पर्वतीय जिलों में पांच साल में 275 गांवों को चकबंदी से जोड़ने का लक्ष्य Dehradun, 04 October 2026 । पहाड़ में खेती बचाने, बिखरी कृषि जोतों को एकीकृत करने और पलायन रोकने के उद्देश्य से लाई गई स्वैच्छिक चकबंदी प्रोत्साहन…

Web Editor Web Editor

एसआईआर के बाद उत्तराखंड में घटे आठ लाख से ज्यादा वोटर के नाम

देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद शनिवार को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित कर दी गई। पुनरीक्षण के बाद प्रदेश में आठ लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कम हुए हैं। अंतिम सूची में कुल 71,58,949 मतदाताओं को शामिल किया गया है, जबकि एसआईआर शुरू होने से पहले प्रदेश में 79,60,762 मतदाता दर्ज थे। हालांकि, दावे-आपत्तियों के निस्तारण…

Web Editor Web Editor
Weather
24 °C
Dehradun
heavy intensity rain
24° _ 24°
86%
2 km/h

Follow US

Discover Categories

Sponsored Content

ट्रेडिंग के नाम पर करोड़ों की ठगी करने वालों को कानपुर से दबोचा

रुद्रपुर (ऊधम सिंह नगर): स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) कुमाऊं ने ट्रेडिंग के नाम पर लोगों से धोखाधड़ी करने वाले दो आरोपितों को कानपुर से गिरफ्तार किया है। अब तक दोनों ने…

Web Editor Web Editor

ओडिशा के रघुराजपुर में भी  दिखी कुमाऊं की सांस्कृतिक आत्मा, पट्टाचित्र में झलकी ‘ऐपण’ 

Raghurajpur Pattachitra Art Shows Kumaon Aipan Cultural Link पुरी (ओडिशा), 29 March 2026 । भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच एक अद्भुत एकता की झलक ओडिशा के रघुराजपुर गांव में देखने को मिलती है, जहां उत्तराखंड की पारंपरिक ‘ऐपण’ कला की छाप साफ नजर आती है। देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज के रूप में स्थापित यह गांव न केवल अपनी प्राचीन पट्टाचित्र कला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह इस बात का भी जीवंत उदाहरण है कि भारत की लोक कलाएं भौगोलिक दूरियों के बावजूद एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पुरी जिले में स्थित यह छोटा सा गांव मानो एक खुली कला दीर्घा (ओपन एयर आर्ट गैलरी) है। यहां प्रवेश करते ही हर घर की दीवारों पर उकेरे गए रंग-बिरंगे म्यूरल्स, पारंपरिक आकृतियां और धार्मिक चित्र आंखों को आकर्षित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा गांव ही एक जीवित संग्रहालय हो, जहां कला केवल दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। भुवनेश्वर से लगभग 55 किलोमीटर और पुरी से करीब 15 किलोमीटर दूर भार्गवी नदी के किनारे बसे इस गांव में लगभग 160 परिवार रहते हैं, और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में कला से जुड़ा हुआ है। यहां कला केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख साधन भी है। पट्टाचित्र और ऐपण: दो संस्कृतियां, एक भाव रघुराजपुर की सबसे बड़ी पहचान ‘पट्टाचित्र’ कला है, जिसमें कपड़े या ताड़पत्र पर प्राकृतिक रंगों से भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण, रामायण और महाभारत के प्रसंगों को उकेरा जाता है। यह शैली काफी हद तक उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की ‘ऐपण’ कला से मेल खाती है, जहां गेरू और चावल के घोल से शुभ प्रतीक, ज्यामितीय आकृतियां और धार्मिक चिह्न बनाए जाते हैं। दोनों ही कलाओं की खासियत उनकी सूक्ष्म रेखाएं, प्रतीकात्मकता और धार्मिक आस्था से जुड़ाव है। यही कारण है कि रघुराजपुर पहुंचने पर कई बार ऐसा महसूस होता है मानो हम कुमाऊं के किसी पारंपरिक गांव में पहुंच गए हों। कला ही जीवन, कला ही पहचान रघुराजपुर में कला केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के लोगों की जीवनशैली में रची-बसी है। घरों की दीवारों से लेकर आंगन तक, हर जगह कला का स्पर्श दिखाई देता है। यहां के बच्चे बचपन से ही गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कला सीखते हैं और इसे आगे बढ़ाते हैं। गांव ने देश को कई महान कलाकार दिए हैं, जिनमें डा. जगन्नाथ महापात्रा (पट्टाचित्र कला), केलुचरण मोहापात्रा और मगुनी चरण दास (ओडिसी नृत्य) प्रमुख हैं। गांव में इनकी स्मृति में स्थापित मूर्तियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। यह गांव जगन्नाथ मंदिर से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां रथ यात्रा में उपयोग होने वाले पारंपरिक ‘पटास’ (कपड़े) बनाए जाते हैं, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाते हैं। विविध शिल्पों का संगम रघुराजपुर केवल पट्टाचित्र तक सीमित नहीं है। यहां ताड़पत्र उत्कीर्णन, लकड़ी और पत्थर की नक्काशी, पपीयर माशे शिल्प, तुसार चित्रकारी, और पारंपरिक ‘गंजापा’ ताश बनाने जैसी कई विधाएं भी प्रचलित हैं। इन सभी कलाओं में स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो इन्हें और भी विशिष्ट बनाता है। पर्यटकों के लिए सीखने का केंद्र यह गांव केवल दर्शनीय स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रशिक्षण केंद्र भी है। पर्यटक यहां कलाकारों को काम करते हुए देख सकते हैं, उनसे बातचीत कर सकते हैं और स्वयं भी इन कलाओं को सीख सकते हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला ‘रघुराजपुर उत्सव’ इस सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का काम करता है। अध्ययन दल ने किया अवलोकन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से प्रेस सूचना ब्यूरो के सहायक निदेशक के नेतृत्व में उत्तराखंड से आए 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने भी इस धरोहर गांव का भ्रमण किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने न केवल यहां की कलाओं को करीब से देखा, बल्कि कलाकारों से संवाद कर उनकी जीवनशैली और परंपराओं को भी समझा। आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल रघुराजपुर आज इस बात का उदाहरण बन चुका है कि यदि पारंपरिक कला को सही दिशा और मंच मिले, तो वह रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। इसी तरह उत्तराखंड की ‘ऐपण’ कला भी आज महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका का बड़ा माध्यम बनती जा रही है। रघुराजपुर और कुमाऊं की कला के बीच यह समानता भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है—जहां परंपराएं भले अलग हों, लेकिन उनकी आत्मा एक ही है।

Web Editor Web Editor

अपडेट : यमुनोत्री धाम पैदल मार्ग पर आवाजाही शुरू

उत्‍तरकाशाी :  यमुनोत्री पैदल मार्ग पर आवाजाही शुरू कर दी गई है। बुधवार को यात्रियों को प्रमुख पडाव जानकीचट्टी से सतर्कतापूर्वक यमुनोत्री धाम के लिए भेजा जा रहा है। यमुनोत्री…

Web Editor Web Editor