श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में बिना ओपन सर्जरी मरीज को मिला नया जीवन

Dehradun, 04 May 2026। श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग ने एक बेहद जटिल और हाई-रिस्क हृदय रोगी का सफल उपचार कर चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। आधुनिक टवी (ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन) तकनीक के जरिए 59 वर्षीय मरीज को बिना ओपन-हार्ट सर्जरी के नया जीवन दिया गया। मरीज गंभीर कैल्सिफिक एओर्टिक स्टेनोसिस और बहु-वाल्व जटिलताओं

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चारधाम यात्रा मार्गों के संवेदनशील हिस्सों पर अब उपग्रह की नजर, समय से पहले मिलेगा खतरे का अलर्ट

Dehradun, 03 May 2026। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा को और अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। अब यात्रा मार्ग के सबसे संवेदनशील करीब 100 किलोमीटर हिस्से पर अत्याधुनिक उपग्रह आधारित निगरानी प्रणाली तैनात की जाएगी। इस हाईटेक सुरक्षा कवच के तहत इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (InSAR) और लिडार तकनीक की मदद

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देहरादून–रामनगर के बीच जल्द दौड़ेगी सीधी ट्रेन

Dehradun to Ramnagar Direct Train Service Soon | Uttarakhand Rail Update Dehradun, 03 May 2026। गढ़वाल क्षेत्र के लिए एक बड़ी सौगात जल्द हकीकत बनने जा रही है। देहरादून और रामनगर के बीच सीधी रेल सेवा शुरू करने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और अब जल्द ही इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाएगा। इस बहुप्रतीक्षित रेल सेवा के शुरू

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ओडिशा के रघुराजपुर में भी  दिखी कुमाऊं की सांस्कृतिक आत्मा, पट्टाचित्र में झलकी ‘ऐपण’ 

Raghurajpur Pattachitra Art Shows Kumaon Aipan Cultural Link पुरी (ओडिशा), 29 March 2026 । भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच एक अद्भुत एकता की झलक ओडिशा के रघुराजपुर गांव में देखने को मिलती है, जहां उत्तराखंड की पारंपरिक ‘ऐपण’ कला की छाप साफ नजर आती है। देश के पहले हेरिटेज क्राफ्ट विलेज के रूप में स्थापित यह गांव न केवल अपनी प्राचीन पट्टाचित्र कला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह इस बात का भी जीवंत उदाहरण है कि भारत की लोक कलाएं भौगोलिक दूरियों के बावजूद एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पुरी जिले में स्थित यह छोटा सा गांव मानो एक खुली कला दीर्घा (ओपन एयर आर्ट गैलरी) है। यहां प्रवेश करते ही हर घर की दीवारों पर उकेरे गए रंग-बिरंगे म्यूरल्स, पारंपरिक आकृतियां और धार्मिक चित्र आंखों को आकर्षित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा गांव ही एक जीवित संग्रहालय हो, जहां कला केवल दीवारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। भुवनेश्वर से लगभग 55 किलोमीटर और पुरी से करीब 15 किलोमीटर दूर भार्गवी नदी के किनारे बसे इस गांव में लगभग 160 परिवार रहते हैं, और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में कला से जुड़ा हुआ है। यहां कला केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख साधन भी है। पट्टाचित्र और ऐपण: दो संस्कृतियां, एक भाव रघुराजपुर की सबसे बड़ी पहचान ‘पट्टाचित्र’ कला है, जिसमें कपड़े या ताड़पत्र पर प्राकृतिक रंगों से भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण, रामायण और महाभारत के प्रसंगों को उकेरा जाता है। यह शैली काफी हद तक उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की ‘ऐपण’ कला से मेल खाती है, जहां गेरू और चावल के घोल से शुभ प्रतीक, ज्यामितीय आकृतियां और धार्मिक चिह्न बनाए जाते हैं। दोनों ही कलाओं की खासियत उनकी सूक्ष्म रेखाएं, प्रतीकात्मकता और धार्मिक आस्था से जुड़ाव है। यही कारण है कि रघुराजपुर पहुंचने पर कई बार ऐसा महसूस होता है मानो हम कुमाऊं के किसी पारंपरिक गांव में पहुंच गए हों। कला ही जीवन, कला ही पहचान रघुराजपुर में कला केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहां के लोगों की जीवनशैली में रची-बसी है। घरों की दीवारों से लेकर आंगन तक, हर जगह कला का स्पर्श दिखाई देता है। यहां के बच्चे बचपन से ही गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कला सीखते हैं और इसे आगे बढ़ाते हैं। गांव ने देश को कई महान कलाकार दिए हैं, जिनमें डा. जगन्नाथ महापात्रा (पट्टाचित्र कला), केलुचरण मोहापात्रा और मगुनी चरण दास (ओडिसी नृत्य) प्रमुख हैं। गांव में इनकी स्मृति में स्थापित मूर्तियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं। यह गांव जगन्नाथ मंदिर से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां रथ यात्रा में उपयोग होने वाले पारंपरिक ‘पटास’ (कपड़े) बनाए जाते हैं, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाते हैं। विविध शिल्पों का संगम रघुराजपुर केवल पट्टाचित्र तक सीमित नहीं है। यहां ताड़पत्र उत्कीर्णन, लकड़ी और पत्थर की नक्काशी, पपीयर माशे शिल्प, तुसार चित्रकारी, और पारंपरिक ‘गंजापा’ ताश बनाने जैसी कई विधाएं भी प्रचलित हैं। इन सभी कलाओं में स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो इन्हें और भी विशिष्ट बनाता है। पर्यटकों के लिए सीखने का केंद्र यह गांव केवल दर्शनीय स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रशिक्षण केंद्र भी है। पर्यटक यहां कलाकारों को काम करते हुए देख सकते हैं, उनसे बातचीत कर सकते हैं और स्वयं भी इन कलाओं को सीख सकते हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला ‘रघुराजपुर उत्सव’ इस सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का काम करता है। अध्ययन दल ने किया अवलोकन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सहयोग से प्रेस सूचना ब्यूरो के सहायक निदेशक के नेतृत्व में उत्तराखंड से आए 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने भी इस धरोहर गांव का भ्रमण किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने न केवल यहां की कलाओं को करीब से देखा, बल्कि कलाकारों से संवाद कर उनकी जीवनशैली और परंपराओं को भी समझा। आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल रघुराजपुर आज इस बात का उदाहरण बन चुका है कि यदि पारंपरिक कला को सही दिशा और मंच मिले, तो वह रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। इसी तरह उत्तराखंड की ‘ऐपण’ कला भी आज महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका का बड़ा माध्यम बनती जा रही है। रघुराजपुर और कुमाऊं की कला के बीच यह समानता भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है—जहां परंपराएं भले अलग हों, लेकिन उनकी आत्मा एक ही है।

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