Green Credit Program Revives Barren Land, Creates Rural Employment in India
देहरादून, 2 जनवरी 2026। हरियाली बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने की दिशा में ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभर रहा है। इस पहल के ज़रिये बंजर और उपेक्षित भूमि को दोबारा उपजाऊ बनाने के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के नए अवसर भी सृजित किए जा रहे हैं। देहरादून स्थित भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) इस कार्यक्रम को देश के 15 राज्यों में व्यापक स्तर पर लागू कर रही है।
कार्यक्रम के तहत 4391 हेक्टेयर ऐसी भूमि को हरित क्षेत्र में बदला जा रहा है, जो वर्षों से कटाव, अंधाधुंध दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण बंजर हो चुकी थी। इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक पद्धतियों से पौधारोपण, मिट्टी सुधार, जल संरक्षण और दीर्घकालिक संरक्षण के कार्य किए जा रहे हैं, ताकि भूमि की प्राकृतिक क्षमता को पुनर्जीवित किया जा सके।
ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम की विशेषता यह है कि यह केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण को भी केंद्र में रखता है। पौधारोपण, नर्सरी संचालन, पौधों की देखरेख और भूमि संरक्षण जैसे कार्यों में स्थानीय ग्रामीणों, स्वयं सहायता समूहों और वन समितियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भूमि पुनर्स्थापन से प्रति हेक्टेयर 50 से 100 मानव-दिवस का रोज़गार सृजित हो सकता है। इस दृष्टि से 4391 हेक्टेयर क्षेत्र में यह पहल हज़ारों परिवारों की आय बढ़ाने में सहायक साबित हो रही है।
कुल मिलाकर, ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम हरियाली, रोज़गार और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली दूरदर्शी पहल बनकर सामने आया है। यह मॉडल न केवल बंजर भूमि के पुनर्जीवन का रास्ता दिखाता है, बल्कि ग्रामीण आजीविका और जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए भी एक ठोस आधार तैयार करता है।
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सालाना अवशोषित होगी 10 टन कार्बन डाइऑक्साइड
पर्यावरणीय दृष्टि से भी कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। शोध के अनुसार, एक हेक्टेयर बंजर भूमि पर हरियाली विकसित होने से प्रतिवर्ष 5 से 10 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण संभव है। इससे न केवल जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम होते हैं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के तापमान और पर्यावरण संतुलन में भी सुधार आता है।
