ARIES Research Improves Weather Forecast Accuracy and Pollution Control
देहरादून, 11 जनवरी 2026: अब मौसम की भविष्यवाणी पहले से कहीं अधिक सटीक और भरोसेमंद हो सकेगी। नैनीताल स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एरीज) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए शोध से यह संभावना मजबूत हुई है। इस अध्ययन में वायुमंडल में मौजूद एरोसोल और जल वाष्प की भूमिका को गहराई से समझाया गया है और बताया गया है कि दोनों की आपसी क्रिया मौसम और जलवायु को किस तरह प्रभावित करती है।
एरीज के नेतृत्व में हुए इस शोध को प्रतिष्ठित एटमॉस्फेरिक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए), ग्रीस के पश्चिमी मैसेडोनिया विश्वविद्यालय और जापान के सोका विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया। यह शोध न केवल मौसम विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु नीति निर्माण के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता है।
शोध में सामने आया है कि एरोसोल और जल वाष्प मिलकर पृथ्वी के विकिरण संतुलन, तापमान और मानसून जैसी प्रमुख मौसमी प्रणालियों को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, वायुमंडल को गर्म करने में जल वाष्प की भूमिका एरोसोल की तुलना में अधिक प्रभावी होती है, लेकिन दोनों के संयुक्त प्रभाव से ही मौसम की दिशा और तीव्रता तय होती है।
एरीज के वैज्ञानिक डॉ. उमेश चंद्र दुमका का कहना है कि यदि मौसम और जलवायु मॉडल में एरोसोल और जल वाष्प दोनों को सही तरीके से शामिल किया जाए, तो भविष्यवाणी की सटीकता में बड़ा सुधार संभव है। वहीं आईआईए के वैज्ञानिक डॉ. शांतिकुमार एस. निंगोमबम ने बताया कि यह अध्ययन इंडो–गंगा मैदान में मानसून, हीटवेव और प्रदूषण के प्रभावों को समझने में बेहद उपयोगी सिद्ध होगा।
इस शोध के परिणाम किसानों, शहरी योजनाकारों और नीति निर्माताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इससे बारिश, हीटवेव, गर्मी और मानसून की समय पर और सटीक जानकारी मिल सकेगी, जिससे किसान अपनी फसलों की बेहतर योजना बना सकेंगे। वहीं शहरों को प्रदूषण और बढ़ती गर्मी से निपटने में मदद मिलेगी और सरकार को प्रदूषण नियंत्रण के लिए अधिक प्रभावी नीतियां तैयार करने का आधार मिलेगा।
क्या है एरोसोल
एरोसोल हवा में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं। इनमें धूल, धुआं, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण कण, समुद्री नमक और परागकण शामिल होते हैं। ये सूर्य की किरणों को सोखते या बिखेरते हैं, जिससे तापमान, बादल बनने की प्रक्रिया और वर्षा प्रभावित होती है।
इंडो–गंगा मैदान पर केंद्रित रहा शोध
यह अध्ययन मुख्य रूप से इंडो–गंगा मैदान क्षेत्र पर आधारित रहा, जो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है। यह देश का सबसे घनी आबादी वाला इलाका है, जहां खेती, उद्योग, यातायात और शहरी गतिविधियों के कारण वायु में एरोसोल की मात्रा अत्यधिक पाई जाती है। इसी कारण इसे दुनिया के सबसे अधिक एरोसोल-प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता है।
मौसम पूर्वानुमान को मिलेगी नई सटीकता
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