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Himalaya Ki Awaj > Blog > उत्तराखंड > सेब की लालिमा पर संकट के बादल
उत्तराखंड

सेब की लालिमा पर संकट के बादल

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Last updated: 2026/01/13 at 1:46 AM
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Apple Production in Uttarakhand at Risk Due to Lack of Snowfall

देहरादून, 13 जनवरी 2026 । उत्तराखंड में इस बार मौसम की बेरुखी से सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ गई है। दिसंबर बीत जाने और जनवरी का आधा महीना गुजरने के बावजूद पर्वतीय इलाकों में अब तक बर्फबारी नहीं हुई है। इसका सीधा असर सेब के रंग, आकार और गुणवत्ता पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द बर्फबारी नहीं हुई तो सेब की प्राकृतिक लालिमा और मिठास प्रभावित हो सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुकसाल के अनुसार सेब की बेहतर गुणवत्ता के लिए 1200 से 1600 घंटे का “चिलिंग आवर” बेहद जरूरी होता है। यह वह अवधि होती है, जब तापमान सात डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है। इस बार सर्दी कमजोर रहने से यह लक्ष्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा, जिसका असर सीधे उत्पादन और बाजार मूल्य पर पड़ेगा। सेब की पहचान उसकी चमकदार लालिमा और साइज से होती है, और यही तत्व उसकी कीमत तय करते हैं।
सेब उत्पादन उत्तराखंड की पर्वतीय अर्थव्यवस्था का अहम आधार है। उत्तरकाशी, देहरादून, टिहरी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चमोली, नैनीताल, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चम्पावत और बागेश्वर जैसे जिलों में हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी है। यदि मौसम ने साथ नहीं दिया तो इन जिलों में किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ेगा।
पहले से ही उत्तराखंड का सेब ब्रांडिंग और विपणन के स्तर पर पहचान के संकट से जूझ रहा है। राज्य गठन के 21 वर्ष बाद भी कई जगह उत्तराखंड का सेब “हिमाचल एप्पल” के नाम से बिकता है। अब यदि गुणवत्ता और रंग पर भी असर पड़ा तो यह समस्या और गहरी हो सकती है।
तुलनात्मक रूप से हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादन में उत्तराखंड से काफी आगे है। हिमाचल में जहां लगभग 1.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती होती है और उत्पादन करीब 7.77 लाख मीट्रिक टन है, वहीं उत्तराखंड में 25,980.55 हेक्टेयर में सेब की खेती से लगभग 64,878 मीट्रिक टन उत्पादन हो रहा है। यह अंतर संसाधनों, मौसम और व्यवस्थागत मजबूती की स्थिति को दर्शाता है।
यदि आने वाले दिनों में बर्फबारी नहीं हुई तो सेब की फसल की गुणवत्ता और बाजार में प्रतिस्पर्धा दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इससे न केवल किसानों की आय घटेगी, बल्कि उत्तराखंड के सेब को अलग पहचान दिलाने के प्रयासों को भी बड़ा झटका लगेगा।
जिला वार सेब उत्पादन व क्षेत्रफल
(क्षेत्रफल हेक्टेयर में, उत्पादन मीट्रिक टन में)
उत्तरकाशी – 9288.46 हेक्टेयर, 29017.88 मीट्रिक टन
देहरादून – 4939.84 हेक्टेयर, 7807 मीट्रिक टन
टिहरी – 3872.87 हेक्टेयर, 1966.15 मीट्रिक टन
पिथौरागढ़ – 1622.10 हेक्टेयर, 3044.12 मीट्रिक टन
अल्मोड़ा – 1578 हेक्टेयर, 11835 मीट्रिक टन
चमोली – 1390.44 हेक्टेयर, 2892.16 मीट्रिक टन
नैनीताल – 1248.76 हेक्टेयर, 4734.95 मीट्रिक टन
पौड़ी – 1174.11 हेक्टेयर, 2987.67 मीट्रिक टन
रुद्रप्रयाग – 434 हेक्टेयर, 217 मीट्रिक टन
चम्पावत – 332 हेक्टेयर, 343 मीट्रिक टन
बागेश्वर – 99.57 हेक्टेयर, 14.23 मीट्रिक टन

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