IIT Roorkee Develops Low-Cost Drone for Artificial Rainfall and Snowfall
रुड़की, 30 जनवरी 2026 । बदलते मौसम चक्र और असंतुलित मानसून के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के वैज्ञानिकों ने एक अहम तकनीकी पहल को साकार किया है। संस्थान ने ऐसा अत्याधुनिक और कम खर्चीला ड्रोन विकसित किया है, जो कृत्रिम वर्षा और बर्फबारी कराने में सक्षम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नवाचार सूखे की मार झेल रहे इलाकों के साथ-साथ वनों में आग की बढ़ती घटनाओं पर भी प्रभावी अंकुश लगाने में सहायक हो सकता है।
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों के अनुसार देश में वर्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश से तबाही मचती है तो कहीं महीनों तक बूंद नहीं गिरती। इसका असर खेती, पेयजल आपूर्ति, भूजल recharge और जलविद्युत परियोजनाओं पर साफ दिखाई देता है। ऐसे हालात में क्लाउड सीडिंग तकनीक को एक व्यावहारिक समाधान माना जा रहा है, जिसमें बादलों में विशेष रसायनों का छिड़काव कर वर्षा की संभावना बढ़ाई जाती है।
अब तक इस तकनीक के लिए विमानों का सहारा लिया जाता रहा है, जो अत्यधिक महंगा और जोखिम भरा विकल्प है। आईआईटी रुड़की का यह ड्रोन लागत, सुरक्षा और पहुंच—तीनों स्तरों पर बेहतर विकल्प बनकर उभरा है। स्वायत्त उड़ान प्रणाली, आधुनिक सेंसर और मौसम विश्लेषण आधारित एआई तकनीक की मदद से यह ड्रोन सटीक ऊंचाई और उपयुक्त समय पर सीडिंग एजेंट का छिड़काव कर सकता है।
संस्थान ने अपने उद्योग साझेदार एक्सेलरेजी के साथ मिलकर इस ड्रोन का सफल परीक्षण भी कर लिया है। यह ड्रोन जमीन से लगभग चार किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है, जिससे पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में भी कृत्रिम वर्षा व बर्फबारी संभव हो सकेगी—जो अब तक बड़ी चुनौती थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि वनाग्नि की घटनाओं के पीछे मिट्टी में नमी की कमी एक प्रमुख कारण है। यदि समय रहते लक्षित इलाकों में कृत्रिम वर्षा कर नमी बनाए रखी जाए, तो जंगलों में आग की आशंका काफी हद तक घटाई जा सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता को भी सुरक्षा मिलेगी।
बाक्स | जल संकट से निपटने की नई उम्मीद
आईआईटी रुड़की की यह तकनीक जल प्रबंधन और आपदा न्यूनीकरण के क्षेत्र में नई राह खोल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सरकारी सहयोग और नीतिगत समर्थन मिलने पर इसे राष्ट्रीय स्तर पर क्लाउड सीडिंग अनुसंधान एवं संचालन ढांचे में शामिल किया जा सकता है। यह पहल भारत को जल संकट और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बना सकती है।
