Gas Shortage Turns Boon for Potters as Clay Ovens Demand Rises in Haridwar
देहरादून, 21 March 2026 । धर्मनगरी में रसोई गैस की कमी ने जहां आम लोगों और होटल व्यवसायियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, वहीं ज्वालापुर के कुम्हारों के लिए यही स्थिति राहत लेकर आई है। गैस सिलेंडरों की कमी के चलते होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट अब पारंपरिक साधनों की ओर लौट रहे हैं, जिससे मिट्टी के चूल्हों, अंगीठियों और तंदूर की मांग तेजी से बढ़ गई है।
लंबे समय से मंदी का सामना कर रहे कुम्हारों के लिए यह दौर किसी नए अवसर से कम नहीं है। बढ़ती मांग को देखते हुए कुम्हार दिन-रात मेहनत कर अलग-अलग आकार के चूल्हे और तंदूर तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि जो काम पहले ठप पड़ चुका था, वही अब तेजी से चल निकला है। बीते कुछ दिनों में बिक्री इतनी बढ़ी है कि उसने पिछले कई महीनों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया है।
इस बदलाव का असर कोयला कारोबार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ढाबों और होटलों में अंगीठियों और तंदूरों के इस्तेमाल बढ़ने से कोयले की मांग में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। स्थानीय कारोबारी बताते हैं कि अब उन्हें पहले से कहीं ज्यादा ऑर्डर मिल रहे हैं और वे लगातार सप्लाई बनाए रखने में जुटे हैं।
स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि आधुनिक रसोई उपकरणों के दौर में पारंपरिक साधन लगभग भुला दिए गए थे, लेकिन गैस संकट ने एक बार फिर इन्हें प्रासंगिक बना दिया है। ज्वालापुर के कुम्हार अब ग्राहकों की जरूरत के अनुसार खास डिजाइन के तंदूर भी तैयार कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हुआ है।
होटल संचालकों का कहना है कि गैस की कमी से जहां काम प्रभावित हो रहा था, वहीं अब मिट्टी के चूल्हों और तंदूर के उपयोग से लागत में कमी आई है। साथ ही, कोयले की आंच पर बने खाने का स्वाद भी ग्राहकों को खासा पसंद आ रहा है।
कुम्हारों के घर लौटी रौनक
कुम्हार समुदाय के लोगों के अनुसार, वर्षों से वे इस पारंपरिक व्यवसाय को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब अचानक बढ़ी मांग ने उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। उनके घरों में खुशहाली लौट आई है और माहौल त्योहार जैसा बन गया है।




