Wildlife Corridor on Delhi-Dehradun Expressway Sees Low Elephant, Leopard Movement
देहरादून, 3 अप्रैल 2026। दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेस-वे पर मोहंड के पास बनाए गए वन्यजीव गलियारे का इस्तेमाल अब धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन बड़े वन्यजीव—खासकर हाथी और गुलदार—अभी भी इससे गुजरने में हिचकिचाते नजर आ रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए हालिया अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक्सप्रेस-वे के करीब 20 किलोमीटर लंबे हिस्से में से 10 किलोमीटर क्षेत्र को विशेष रूप से वन्यजीव अंडरपास के रूप में विकसित किया गया है। यह इलाका उत्तर प्रदेश के गणेशपुर से लेकर देहरादून तक फैला है और शिवालिक हाथी कॉरिडोर का अहम हिस्सा माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए यहां वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए यह संरचना तैयार की गई।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने 40 दिनों तक इलाके की लगातार निगरानी की। इसके लिए 150 कैमरा ट्रैप लगाए गए, जिनसे विभिन्न प्रजातियों की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया गया। अध्ययन क्षेत्र को तीन अलग-अलग जोन में बांटा गया था, जिनमें समतल और पहाड़ी दोनों प्रकार के भू-भाग शामिल हैं।
रिपोर्ट में सामने आया है कि इस गलियारे का सबसे अधिक उपयोग शाकाहारी जीव कर रहे हैं। नदी किनारे और घने जंगलों वाले हिस्सों में नीलगाय, सांभर और चीतल की गतिविधियां अधिक दर्ज की गईं, जबकि जहां मानव हस्तक्षेप ज्यादा है, वहां बड़े वन्यजीवों की मौजूदगी कम रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े और संवेदनशील वन्यजीव किसी नई संरचना को अपनाने में समय लेते हैं। ऐसे में हाथी और तेंदुए की कम मौजूदगी फिलहाल स्वाभाविक मानी जा रही है। यदि क्षेत्र में मानव गतिविधियों को सीमित किया जाए और प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा जाए, तो भविष्य में इन बड़े जीवों की आवाजाही भी बढ़ सकती है।
मोहंड का यह वन्यजीव गलियारा जैव विविधता संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। जहां एक ओर कई प्रजातियां तेजी से इस नए ढांचे के साथ अनुकूल हो रही हैं, वहीं कुछ को अभी और समय की जरूरत है।
शाकाहारी जीवों की बढ़ी सक्रियता
अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, नीलगाय की 12,432 और सांभर की 10,534 बार मौजूदगी दर्ज की गई। इसके अलावा चीतल भी 8,015 बार कैमरा ट्रैप में कैद हुआ, जो इस गलियारे के प्रति उनकी बढ़ती स्वीकृति को दर्शाता है।
: बड़े वन्यजीवों की सीमित मौजूदगी
वहीं हाथियों की उपस्थिति केवल 300 बार दर्ज की गई, जबकि तेंदुए (गुलदार) की मौजूदगी महज 25 बार रिकॉर्ड हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े वन्यजीवों के व्यवहार में बदलाव आने में समय लगता है, इसलिए उनकी कम उपस्थिति फिलहाल चिंता का विषय नहीं है।




