Algae-Based Technology to Turn Wastewater into Drinking Water: IIT Roorkee Research
रुड़की, 15 February 2026 । जल संकट और स्वच्छ पेयजल की बढ़ती चुनौती के बीच Indian Institute of Technology Roorkee के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में नालों और सीवर के गंदे पानी को भी पीने योग्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस शोध में काई यानी एल्गी को मुख्य आधार बनाया गया है, जो प्राकृतिक तरीके से वेस्ट वाटर को साफ करने में सक्षम है।
आईआईटी रुड़की में किए गए इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर संजीव कुमार प्रजापति ने किया। शोध माइक्रोएल्गल फोटोग्रैन्यूल्स नामक तकनीक पर आधारित है। इसमें काई और उपयोगी बैक्टीरिया मिलकर छोटे-छोटे गोल ढांचे बनाते हैं, जो गंदे पानी में मौजूद प्रदूषकों को खत्म करने का काम करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया प्रकृति में पहले से मौजूद तंत्र पर आधारित है, जहां काई सूर्य के प्रकाश की मदद से भोजन बनाती है और साथ ही पानी की गंदगी को अपने भीतर समाहित कर लेती है।
शोध के अनुसार, गंदे पानी को पहले एक विशेष टैंक में डाला जाता है। इसके बाद उसमें माइक्रोएल्गल फोटोग्रैन्यूल्स मिलाए जाते हैं। सूर्य की रोशनी या कृत्रिम प्रकाश मिलने पर काई प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया शुरू कर देती है। इस दौरान पानी में मौजूद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, कार्बनिक अपशिष्ट और सूक्ष्म प्रदूषक धीरे-धीरे अवशोषित हो जाते हैं। कुछ समय बाद पानी काफी हद तक साफ हो जाता है, जिसे आगे आधुनिक फिल्ट्रेशन और डिसइन्फेक्शन तकनीक से जोड़कर पीने योग्य स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ऊर्जा की खपत बेहद कम होती है और किसी भी तरह के हानिकारक रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यही नहीं, काई से प्राप्त बायोमास का उपयोग खाद या ऊर्जा उत्पादन में भी किया जा सकता है।
प्रोफेसर प्रजापति के अनुसार, आने वाले समय में यह तकनीक जल संकट से जूझ रहे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बड़ी राहत बन सकती है। आईआईटी रुड़की का यह शोध साबित करता है कि प्रकृति आधारित समाधान अपनाकर गंदे पानी को भी सुरक्षित पेयजल में बदला जा सकता है।


