Grass Pollen Study Reveals Ancient Agriculture History in India’s Ganga Plains
देहरादून, 10 Aapril 2026: भारत की प्राचीन खेती की कहानी अब खेतों या दस्तावेजों से नहीं, बल्कि हवा में मौजूद सूक्ष्म परागकणों के जरिए सामने आ रही है। बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने गंगा के मैदानी इलाकों में घास के परागकणों के अध्ययन से हजारों साल पुराने कृषि इतिहास को समझने की नई तकनीक विकसित की है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका The Holocene में प्रकाशित हुआ है।
शोध टीम, जिसका नेतृत्व डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने किया, ने पाया कि गेहूं, चावल, जौ और बाजरा जैसी फसलों के परागकण जंगली घास से अलग पहचानना मुश्किल होता है। इस चुनौती को हल करते हुए वैज्ञानिकों ने परागकणों के आकार और उनके बाहरी वलय के आधार पर नई पहचान विधि विकसित की।
अध्ययन में सामने आया कि बड़े आकार और मोटे वलय वाले परागकण खेती वाली फसलों के संकेत देते हैं, जबकि छोटे परागकण जंगली घास से जुड़े होते हैं। इस आधार पर एक नई “बायोमेट्रिक सीमा” तय की गई, जो खेती और प्राकृतिक वनस्पतियों में अंतर स्पष्ट करती है।
गंगा का मैदान इस शोध का केंद्र इसलिए बना क्योंकि यहां हजारों वर्षों से खेती होती रही है। खास बात यह रही कि इस बार अध्ययन भारतीय परिस्थितियों पर आधारित डेटा से किया गया, जिससे निष्कर्ष अधिक सटीक और स्थानीय संदर्भ में उपयोगी बने।
इस शोध का संबंध हिमालय और गंगोत्री क्षेत्र से भी जुड़ता है, जहां से निकलने वाली गंगा ने मैदानों को उपजाऊ बनाया। इस तरह यह अध्ययन उत्तराखंड के पर्यावरणीय इतिहास को समझने में भी सहायक साबित होगा।
वैज्ञानिकों के अनुसार, मिट्टी में सुरक्षित परागकणों के जरिए अब यह जाना जा सकेगा कि प्राचीन काल में कौन-सी फसलें उगाई जाती थीं, जलवायु कैसी थी और मानव ने प्रकृति को किस तरह प्रभावित किया। यह खोज भविष्य में टिकाऊ खेती और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी नई संभावनाएं खोलती है।




