अल्मोड़ा और उत्तरकाशी में सबसे ज्यादा असर, आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
Dehradun, 22 May 2026। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती का संकट अब केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह गांवों से बढ़ते पलायन की बड़ी वजह बनता जा रहा है। उत्तराखंड पलायन निवारण आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य में फसल उत्पादन और कृषि पैदावार में लगातार गिरावट के चलते बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक स्थिति अल्मोड़ा और उत्तरकाशी जिलों की सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार अल्मोड़ा में 8.37 प्रतिशत और उत्तरकाशी में 7.14 प्रतिशत लोगों ने खेती से घटती आमदनी और कम होती उपज को पलायन का प्रमुख कारण बताया है। इसके अलावा चंपावत में 6.31 प्रतिशत, टिहरी गढ़वाल में 6.17 प्रतिशत और पौड़ी गढ़वाल में 5.35 प्रतिशत लोगों ने भी खेती की खराब स्थिति को गांव छोड़ने की अहम वजह माना है। राज्य स्तर पर यह औसत 5.44 प्रतिशत दर्ज किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों में पारंपरिक कृषि व्यवस्था तेजी से कमजोर हो रही है। सिंचाई सुविधाओं का अभाव, अनियमित बारिश, जलवायु परिवर्तन और खेती योग्य भूमि का बंजर होना किसानों की परेशानियां बढ़ा रहा है। इसके साथ ही बंदर, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीव फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे किसानों का खेती से मोहभंग होता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले खेती परिवारों की आर्थिक रीढ़ हुआ करती थी, लेकिन अब मेहनत और लागत के मुकाबले पर्याप्त उत्पादन नहीं मिल पा रहा। यही वजह है कि युवा पीढ़ी गांवों में भविष्य नहीं देख रही और रोजगार व बेहतर जीवन की तलाश में देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश और अन्य शहरों की ओर पलायन कर रही है। इसका असर गांवों की सामाजिक संरचना पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कई गांवों में अब केवल बुजुर्ग रह गए हैं, जबकि खेत खाली और बंजर पड़े हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार पलायन रोकना चाहती है तो पर्वतीय कृषि को लाभकारी और आधुनिक बनाना होगा। सिंचाई योजनाओं का विस्तार, कृषि आधारित रोजगार, आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल और जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए ठोस नीति अपनाने की जरूरत है। आयोग की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि खेती को मजबूत किए बिना पहाड़ों से पलायन रोकना आसान नहीं होगा।




