Turtles to Measure Ganga Cleanliness | WII & TSAFI Conservation Project
देहरादून, 28 जनवरी 2026। अब गंगा की निर्मलता और पारिस्थितिक स्वास्थ्य का आकलन केवल जल जांच रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कछुओं की मौजूदगी और उनके व्यवहार से भी नदी की सेहत को परखा जाएगा। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के वैज्ञानिकों ने चित्रा इंडिका और बटागुर प्रजाति के कछुओं को गंगा के लिए “जीवित सूचक” के रूप में विकसित किया है। टर्टल सर्वाइवल एलायंस इंडिया (टीएसएएफआई) के सहयोग से संचालित यह परियोजना गंगा को स्वच्छ के साथ-साथ जैव विविधता से समृद्ध और संतुलित नदी के रूप में पुनर्जीवित करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि कछुए नदी पारिस्थितिकी तंत्र के मौन रक्षक होते हैं। उनकी सक्रियता यह दर्शाती है कि नदी का जल स्वच्छ, ऑक्सीजन युक्त और जैविक संतुलन में है। जिन नदियों में कछुए सुरक्षित और स्वस्थ रहते हैं, वहां प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। इसी आधार पर गंगा की जैविक सेहत को मापने के लिए इन दुर्लभ प्रजातियों को चुना गया है।
चित्रा इंडिका, जिसे भारतीय नैरो-हेडेड सॉफ्टशेल टर्टल कहा जाता है, मीठे पानी के सबसे बड़े कछुओं में शामिल है। यह मृत जैविक पदार्थ और कार्बनिक अवशेषों को खाकर नदी की प्राकृतिक सफाई में योगदान देता है। इसकी मौजूदगी गंगा में बेहतर जल गुणवत्ता का संकेत मानी जाती है। वहीं बटागुर कछुआ, जिसे नॉर्दर्न रिवर टेरापिन कहा जाता है, नदी तटों की प्राकृतिक स्थिति और सुरक्षित पर्यावरण का सूचक है। यह प्रजाति केवल शांत, स्वच्छ और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्रों में ही सफल प्रजनन कर पाती है।
केंद्रीय मंत्री सी.आर. पाटिल ने कहा कि कछुए नदी प्रणालियों के मूक प्रहरी हैं और उनकी उपस्थिति पारिस्थितिक संतुलन का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि यह परियोजना दिखाती है कि वैज्ञानिक पुनर्प्रवेश, सतत निगरानी और स्थानीय समुदाय की सहभागिता से लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण संभव है। भारत अब नदियों को केवल साफ करने तक सीमित नहीं, बल्कि उनकी जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए भी गंभीर प्रयास कर रहा है।
बॉक्स : 30 कछुओं पर लगाये गए ट्रांसमीटर
परियोजना के अंतर्गत मध्य यमुना में पाले गए 15 चित्रा इंडिका कछुओं को छोड़ा गया, जिनमें से 10 को रेडियो ट्रांसमीटर से टैग किया गया है। इसके अलावा 20 बटागुर कछुओं को एकॉस्टिक ट्रांसमीटर से टैग कर उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित हैदरपुर आर्द्रभूमि परिसर के पास, ऊपरी गंगा के संरक्षित क्षेत्र में छोड़ा गया है। यह वही इलाका है जहां करीब तीन दशक बाद बटागुर कछुओं की ऐतिहासिक वापसी कराई गई है।
