Dehradun, july 2026। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल लोगों की जान का जोखिम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है। वन विभाग के अध्ययन के अनुसार वर्ष 2011 से 2025 के बीच 63,478 मवेशी बाघ, गुलदार और अन्य वन्यजीवों का शिकार बने। यानी प्रदेश में हर वर्ष औसतन 4,534 मवेशी वन्यजीवों के हमलों में मारे जा रहे हैं। इससे पशुपालन पर निर्भर हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 71.05 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित है। ऐसे में जंगलों से सटे गांवों में रहने वाले किसान और पशुपालक सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। बाघ और गुलदार गाय, भैंस, बैल, भेड़ और बकरियों को लगातार निशाना बना रहे हैं। कई क्षेत्रों में लगातार हो रहे हमलों के कारण लोग अब पशुपालन बढ़ाने से भी हिचकने लगे हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अप्रैल 2011 से मार्च 2025 के बीच 18,994 फसल क्षति की घटनाएं दर्ज हुईं। यानी हर साल औसतन 1,356 मामलों में किसानों की फसलें जंगली सूअर, बंदर, लंगूर, हाथी और अन्य वन्यजीवों से बर्बाद हुईं। धान, मक्का, गेहूं, सब्जियां और अन्य नकदी फसलें सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं, जिससे किसानों की आय और खेती की लाभप्रदता पर असर पड़ रहा है।
वन विभाग की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2020-21 के बाद हालात और गंभीर हुए हैं। अब प्रतिवर्ष 5,000 से 6,500 तक मवेशी वन्यजीवों के हमलों का शिकार बन रहे हैं। विशेषज्ञ इसके पीछे प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव और जंगलों के आसपास मानव गतिविधियों के विस्तार को प्रमुख कारण मानते हैं।
अपर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) विवेक पांडेय के अनुसार राज्य सरकार मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए आधुनिक निगरानी तकनीक, सौर ऊर्जा आधारित सुरक्षा प्रणाली, मजबूत बाड़, त्वरित मुआवजा व्यवस्था और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। उनका कहना है कि इन उपायों से ग्रामीणों, पशुधन और फसलों की सुरक्षा को मजबूत बनाने का प्रयास किया जा रहा है।




