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देश-विदेश

धान की नई तकनीक से 35% तक घटेगी मीथेन गैस

Web Editor
Last updated: 2026/03/29 at 2:13 AM
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4 Min Read
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अब ‘ग्रीन खेती’ की ओर कदम: धान की नई तकनीक से 35% तक घटेगी मीथेन गैस

सीढ़ीदार खेतों वाले उत्तराखंड के लिए कारगर मॉडल, वैज्ञानिकों ने सुझाए आसान उपाय

देहरादून, 29 March 2026। जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच अब खेती भी ‘ग्रीन टेक्नोलॉजी’ की ओर तेजी से बढ़ रही है। धान की पारंपरिक खेती को बदलकर अपनाई जा रही नई वैज्ञानिक विधियां न सिर्फ उत्पादन बढ़ा रही हैं, बल्कि खतरनाक मीथेन गैस के उत्सर्जन को भी काफी हद तक कम कर रही हैं। कटक स्थित राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह बात सामने आई है कि आधुनिक तकनीकों से धान की खेती करने पर मीथेन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मीथेन गैस भले ही वातावरण में कम मात्रा में पाई जाती है, लेकिन यह कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक प्रभावी ग्रीनहाउस गैस है। ऐसे में धान की खेती में बदलाव जलवायु संतुलन के लिए अहम कदम साबित हो सकता है।
हाल ही में प्रेस सूचना ब्यूरो देहरादून के सौजन्य से 13 सदस्यीय मीडिया दल ने ओडिशा का अध्ययन दौरा किया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि पिछले 15 वर्षों से धान की खेती को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने पर शोध किया जा रहा है और अब इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
संस्थान के निदेशक डा. प्रताप भट्टाचार्य ने बताया कि संस्थान अब तक 194 से अधिक धान की प्रजातियों पर काम कर चुका है। साथ ही कम पानी और कम समय में अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्मों पर भी शोध जारी है। उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में खाद्य संकट से निपटने में भी संस्थान की अहम भूमिका रही थी।
वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार के अनुसार, अब ऐसी किस्में विकसित की जा रही हैं जो कम अवधि में तैयार होती हैं और जिनसे गैस का उत्सर्जन भी कम होता है।
कैसे बदलेगी खेती की तस्वीर
धान की खेती में सबसे बड़ा बदलाव जल प्रबंधन और बुवाई तकनीक में किया गया है। “अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग” तकनीक में खेत को लगातार पानी से भरे रखने के बजाय सूखने दिया जाता है, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन पहुंचती है और मीथेन पैदा करने वाले बैक्टीरिया कम हो जाते हैं।
इसके अलावा “डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर)” तकनीक में बीज सीधे सूखी या कम नमी वाली मिट्टी में बोए जाते हैं, जिससे शुरुआती चरण में पानी की जरूरत कम होती है और उत्सर्जन घटता है।
उत्तराखंड के लिए क्यों खास
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के सीढ़ीदार खेतों में यह तकनीक बेहद कारगर साबित हो सकती है। यहां सीमित पानी और भौगोलिक परिस्थितियों के चलते डीएसआर जैसी विधियां किसानों के लिए फायदेमंद रहेंगी।
वैज्ञानिकों का नया प्रयोग
संस्थान ने एमटी-22 नामक विशेष बैक्टीरिया भी विकसित किया है, जो मीथेन को कम हानिकारक गैस में बदल देता है। इसे मिट्टी में मिलाने से उत्सर्जन और कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, धान की खेती में यह बदलाव न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित होगा।

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TAGGED: New rice farming techniques developed by CRRI can reduce methane emissions by up to 35%. Experts say these methods are highly suitable for Uttarakhand’s terrace farming.
Web Editor March 29, 2026
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