Dehradun,08 july2026। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भोजन नली (इसोफेगस) के कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे छिपे कारणों की अब वैज्ञानिक पड़ताल होगी। श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल के कैंसर विभाग ने पहाड़ों से आने वाले मरीजों में इस बीमारी के जोखिम कारकों का व्यापक शोध शुरू करने का निर्णय लिया है। इस अध्ययन के आधार पर कैंसर की रोकथाम, समय रहते पहचान, आधुनिक उपचार और जन-जागरूकता के लिए वैज्ञानिक रणनीति तैयार की जाएगी।
अस्पताल के कैंसर सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार गर्ग ने बताया कि उत्तराखंड के विभिन्न पर्वतीय जिलों से बड़ी संख्या में भोजन नली के कैंसर के मरीज उपचार के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं। इन्हीं मरीजों के उपचार और अनुभव के आधार पर शोध की योजना बनाई गई है। अध्ययन के दौरान यह पता लगाया जाएगा कि तंबाकू, धूम्रपान, शराब, अत्यधिक गर्म चाय या भोजन, फल एवं सब्जियों की कमी, पोषण असंतुलन, मोटापा, एसिड रिफ्लक्स, घरों के भीतर धुएं का संपर्क, पेयजल की गुणवत्ता, पर्यावरणीय परिस्थितियां और अन्य स्थानीय कारण इस बीमारी में कितनी भूमिका निभाते हैं। शोध किसी एक कारण पर नहीं, बल्कि सभी संभावित जोखिम कारकों के प्रमाण-आधारित विश्लेषण पर केंद्रित होगा।
डॉ. गर्ग ने बताया कि अस्पताल में अब तक कई मरीजों का सर्जरी, कीमोथेरेपी और अन्य आधुनिक उपचार विधियों से सफल इलाज किया जा चुका है। कई मरीज उपचार के पांच वर्ष बाद भी स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रहे हैं। चयनित मरीजों में मिनिमली इनवेसिव इसोफेगेक्टॉमी यानी दूरबीन विधि से भी सफल ऑपरेशन किए जा चुके हैं। इस तकनीक में बड़े चीरे की बजाय छोटे छिद्रों के माध्यम से सर्जरी की जाती है, जिससे ऑपरेशन के बाद दर्द, फेफड़ों से जुड़ी जटिलताओं और अस्पताल में रहने की अवधि कम हो सकती है तथा मरीज जल्द सामान्य जीवन में लौट सकता है।
अस्पताल में भोजन नली के कैंसर की जांच और उपचार के लिए अपर जीआई एंडोस्कोपी, बायोप्सी, पैथोलॉजी, सीटी स्कैन, कीमोथेरेपी, ओपन एवं दूरबीन विधि से कैंसर सर्जरी, गहन चिकित्सा, दर्द नियंत्रण, पोषण सहायता, फिजियोथेरेपी और नियमित फॉलो-अप जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। जटिल मामलों में कैंसर विशेषज्ञ, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और पोषण विशेषज्ञ मिलकर मरीज की उपचार योजना तैयार करते हैं।
उन्होंने बताया कि भोजन नली का कैंसर मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है। स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का संबंध तंबाकू, धूम्रपान, शराब, अत्यधिक गर्म भोजन-पेय और पोषण की कमी से हो सकता है, जबकि एडेनोकार्सिनोमा लंबे समय से एसिड रिफ्लक्स, बैरेट इसोफेगस और मोटापे से जुड़ा माना जाता है। कई मरीजों में एक से अधिक जोखिम कारक एक साथ पाए जाते हैं।
डॉ. गर्ग ने कहा कि निगलने में लगातार कठिनाई, ठोस भोजन का अटकना, बिना कारण वजन कम होना, छाती में दर्द या जलन, लगातार खांसी और आवाज में बदलाव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेकर आवश्यक होने पर अपर जीआई एंडोस्कोपी करानी चाहिए। उनका कहना है कि कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान होने पर उपचार की सफलता और लंबे समय तक स्वस्थ जीवन की संभावना काफी बढ़ जाती है।
शोध के दौरान मरीजों की आयु, निवास स्थान, खान-पान, तंबाकू एवं शराब सेवन की आदत, अत्यधिक गर्म खाद्य-पेय पदार्थों का उपयोग, पोषण स्तर, पेशा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, पर्यावरणीय संपर्क, बीमारी की अवस्था, उपचार और दीर्घकालिक परिणामों का भी अध्ययन किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर अन्य चिकित्सा एवं शोध संस्थानों के विशेषज्ञों का सहयोग भी लिया जाएगा। अस्पताल का मानना है कि यह शोध उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भोजन नली के कैंसर के वास्तविक कारणों को समझने और भविष्य की कैंसर नियंत्रण नीति को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।




