Satellite Study Warns of Changing Himalayan Greening in Uttarakhand
देहरादून, 11 February 2026: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल अनुमान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों में साफ दिखाई देने लगा है। उपग्रह आधारित एक विस्तृत अध्ययन में सामने आया है कि बीते करीब 22 वर्षों में हिमालय की हरियाली के स्वरूप में उल्लेखनीय बदलाव आया है। जंगलों, घास के मैदानों और घाटियों में पेड़-पौधों के रंग, घनत्व और फैलाव में हो रहे ये परिवर्तन हिमालय के नाजुक पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर चेतावनी माने जा रहे हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईईएस), नैनीताल के वैज्ञानिकों ने भारत और विदेश के विशेषज्ञों के सहयोग से वर्ष 2001 से 2022 तक उत्तराखंड की वनस्पति, प्रदूषण और जलवायु प्रभावों का गहन अध्ययन किया। इस शोध में उपग्रह आधारित वैश्विक मंच Google Earth Engine का इस्तेमाल किया गया, जिससे लंबे समय के डाटा का एक साथ विश्लेषण संभव हो पाया।
अध्ययन का नेतृत्व एआरआईईएस के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. उमेश चंद्र दुमका ने किया। उनके अनुसार, एनडीवीआई (नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स) और ईवीआई (एन्हांस्ड वेजिटेशन इंडेक्स) जैसे पैमानों से यह स्पष्ट हुआ है कि मानसून के बाद हरियाली अपने चरम पर होती है, जबकि मानसून से पहले इसमें सबसे अधिक कमी देखी जाती है। यह बदलाव केवल मौसमी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है।
डॉ. दुमका का कहना है कि जंगलों की कटाई, कृषि भूमि का विस्तार, अवैध कटान, सड़क निर्माण और बढ़ता शहरी-औद्योगिक प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। इसके साथ ही तापमान और वर्षा में हो रहे असंतुलन का सीधा असर भी वनस्पति पर पड़ रहा है। पियरसन सहसंबंध जैसी सांख्यिकीय विधियों से यह समझने की कोशिश की गई कि जलवायु कारक किस तरह हरियाली को प्रभावित कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह स्थिति बनी रही तो जैव विविधता को नुकसान, जल स्रोतों में कमी और नदियों पर निर्भर आबादी की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल Environmental Monitoring and Assessment में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि उपग्रह विज्ञान भविष्य में एक प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली बन सकता है, जिससे समय रहते संरक्षण और नीतिगत निर्णय लेकर हिमालयी पर्यावरण को बचाया जा सके।


