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ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में सूक्ष्मजीव नवाचार पर अंतरराष्ट्रीय मंथन शुरू

Web Editor
Last updated: 2026/02/20 at 6:12 PM
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International Conference on Microbial Innovation for Sustainable Development Begins in Dehradun

देहरादून, 20 February 2026 । ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में शुक्रवार से “सतत विकास के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस आयोजन में 10 देशों और भारत के 16 राज्यों से आए वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विशेषज्ञ अपने शोध पत्रों के माध्यम से नवीनतम खोजों और तकनीकों को साझा कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि आईसीएआर के निदेशक डॉ. एम. मधु ने कहा कि मृदा की गिरती गुणवत्ता देश के समग्र विकास के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों के प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता में सुधार संभव है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि हरित तकनीकों के विकास में सूक्ष्मजीवों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और यह सतत विकास की दिशा में ठोस आधार प्रदान करता है।
सम्मेलन के दौरान कुल छह तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें बायोरिमेडिएशन, पर्यावरण संरक्षण, कृषि उत्पादकता, फसल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। विशेषज्ञ इन क्षेत्रों में हो रहे नए शोध और नवाचारों पर अपने विचार रखेंगे।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा यूकॉस्ट और अन्य सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर किया जा रहा है। कार्यक्रम में डॉ. नरेश कुमार शर्मा, डॉ. अंजू रानी समेत कई प्रमुख वैज्ञानिक, शोधार्थी और विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना और सतत विकास के लिए नई दिशा तय करना है।

 

सूक्ष्मजीव नवाचार पर अंतरराष्ट्रीय मंथन शुरू
सतत विकास और कृषि सुधार में माइक्रोब्स की अहम भूमिका पर चर्चा
देहरादून, लोकसत्य। ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में शुक्रवार से “सतत विकास के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस आयोजन में 10 देशों और भारत के 16 राज्यों से आए वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विशेषज्ञ अपने शोध पत्रों के माध्यम से नवीनतम खोजों और तकनीकों को साझा कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि आईसीएआर के निदेशक डॉ. एम. मधु ने कहा कि मृदा की गिरती गुणवत्ता देश के समग्र विकास के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों के प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता में सुधार संभव है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि हरित तकनीकों के विकास में सूक्ष्मजीवों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और यह सतत विकास की दिशा में ठोस आधार प्रदान करता है।
सम्मेलन के दौरान कुल छह तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें बायोरिमेडिएशन, पर्यावरण संरक्षण, कृषि उत्पादकता, फसल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। विशेषज्ञ इन क्षेत्रों में हो रहे नए शोध और नवाचारों पर अपने विचार रखेंगे।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा यूकॉस्ट और अन्य सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर किया जा रहा है। कार्यक्रम में डॉ. नरेश कुमार शर्मा, डॉ. अंजू रानी समेत कई प्रमुख वैज्ञानिक, शोधार्थी और विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना और सतत विकास के लिए नई दिशा तय करना है।

 

सूक्ष्मजीव नवाचार पर अंतरराष्ट्रीय मंथन शुरू
सतत विकास और कृषि सुधार में माइक्रोब्स की अहम भूमिका पर चर्चा
देहरादून, 20 February 2026 । ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में सूक्ष्मजीव नवाचार पर अंतरराष्ट्रीय मंथन शुरू
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देहरादून, लोकसत्य। ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में शुक्रवार से “सतत विकास के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस आयोजन में 10 देशों और भारत के 16 राज्यों से आए वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विशेषज्ञ अपने शोध पत्रों के माध्यम से नवीनतम खोजों और तकनीकों को साझा कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि आईसीएआर के निदेशक डॉ. एम. मधु ने कहा कि मृदा की गिरती गुणवत्ता देश के समग्र विकास के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों के प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता में सुधार संभव है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि हरित तकनीकों के विकास में सूक्ष्मजीवों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और यह सतत विकास की दिशा में ठोस आधार प्रदान करता है।
सम्मेलन के दौरान कुल छह तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें बायोरिमेडिएशन, पर्यावरण संरक्षण, कृषि उत्पादकता, फसल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। विशेषज्ञ इन क्षेत्रों में हो रहे नए शोध और नवाचारों पर अपने विचार रखेंगे।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा यूकॉस्ट और अन्य सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर किया जा रहा है। कार्यक्रम में डॉ. नरेश कुमार शर्मा, डॉ. अंजू रानी समेत कई प्रमुख वैज्ञानिक, शोधार्थी और विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना और सतत विकास के लिए नई दिशा तय करना है।शुक्रवार से “सतत विकास के लिए माइक्रोबियल इनोवेशन” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस आयोजन में 10 देशों और भारत के 16 राज्यों से आए वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विशेषज्ञ अपने शोध पत्रों के माध्यम से नवीनतम खोजों और तकनीकों को साझा कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि आईसीएआर के निदेशक डॉ. एम. मधु ने कहा कि मृदा की गिरती गुणवत्ता देश के समग्र विकास के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों के प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता में सुधार संभव है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
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