1902 में बनी ऐतिहासिक पौड़ी जेल का होगा संरक्षण, एक वर्ष में तैयार होगा संग्रहालय
Dehradun, 19 july 2026। ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1902 में स्थापित गढ़वाल मंडल की पहली जिला जेल अब इतिहास की नई पहचान बनने जा रही है। स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखंड के अनेक जनआंदोलनों की साक्षी रही इस ऐतिहासिक इमारत को विरासत संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा। जिला योजना के तहत इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए 1.77 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं, जबकि 37.89 लाख रुपये की पहली किस्त भी जारी हो चुकी है। प्रशासन ने संग्रहालय का निर्माण कार्य एक वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा है।
संग्रहालय को इस तरह विकसित किया जाएगा कि यहां आने वाले लोगों को ब्रिटिशकालीन जेल व्यवस्था का वास्तविक अनुभव मिल सके। मुख्य प्रवेश द्वार पर तत्कालीन सुरक्षा कर्मियों की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी, जबकि जेलर कक्ष को पुराने स्वरूप में संरक्षित कर उस दौर की कार्यप्रणाली दर्शाई जाएगी। बैरक, कैदखाने और कालकोठरियों को भी मूल स्वरूप में सुरक्षित रखते हुए वहां कैदियों के जीवन, जेल व्यवस्था और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी जानकारियां प्रदर्शित की जाएंगी।
करीब 910 वर्गमीटर में फैली यह जेल केवल अपराधियों को रखने का स्थान नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम, कुली बेगार आंदोलन, गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन, आपातकाल और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन जैसे ऐतिहासिक संघर्षों की भी साक्षी रही है। वर्ष 1921 के असहयोग आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक यहां 396 राजनीतिक बंदियों को रखा गया। जेल की क्षमता मात्र आठ कैदियों की थी, इसलिए लंबी सजा पाने वालों को बाद में अन्य जेलों में भेजा जाता था।
इस जेल में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, गोविंद बल्लभ पंत, कप्तान रामप्रसाद नौटियाल, बलदेव सिंह आर्य, भक्त दर्शन, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मंगतराम खंतवाल, बड़ोला बंधु, कोतवाल सिंह नेगी, भोला दत्त चंदोला, जीवनंद खंडूड़ी और महेशानंद थपलियाल सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानी और जननेता बंदी रहे। उनकी पैरवी बैरिस्टर मुकुंदी लाल और गोविंद बल्लभ पंत जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने की थी।
वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने इस भवन को संग्रहालय में बदलने की घोषणा की थी। अब यह योजना धरातल पर उतर रही है। जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने कहा कि यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि गढ़वाल के गौरवशाली इतिहास की जीवंत धरोहर है। संग्रहालय नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखंड के जनआंदोलनों की विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।




