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Reading: पगडंडियों से मैराथन ट्रैक तक पहुंची भागीरथी, अब ओलंपिक की उड़ान का सपना
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Himalaya Ki Awaj > Blog > उत्तराखंड > पगडंडियों से मैराथन ट्रैक तक पहुंची भागीरथी, अब ओलंपिक की उड़ान का सपना
उत्तराखंड

पगडंडियों से मैराथन ट्रैक तक पहुंची भागीरथी, अब ओलंपिक की उड़ान का सपना

Web Editor
Last updated: 2026/09/03 at 4:42 PM
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3 Min Read
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Dehradun, 03 September 2026। चमोली के सीमांत वाण गांव की कठिन पगडंडियों पर दौड़ते हुए जिस बेटी ने अपनी राह खुद गढ़ी, वह अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मैराथन में उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही है। 24 वर्षीय भागीरथी बिष्ट ने हैदराबाद मैराथन में 42 किलोमीटर की दूरी महज 2 घंटे 51 मिनट में पूरी कर दूसरा स्थान हासिल किया है। रजत पदक जीतने के बाद उनकी नजर अब उस सपने पर है, जहां तिरंगे के साथ ओलंपिक ट्रैक पर उतरना है।
भागीरथी की सफलता की कहानी किसी सुविधासंपन्न प्रशिक्षण केंद्र से नहीं, बल्कि पहाड़ के एक दुर्गम गांव से शुरू हुई। जब वह महज तीन वर्ष की थीं, पिता सोहन सिंह बिष्ट का निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी मां राधा देवी के कंधों पर आ गई। उन्होंने गांव के स्कूल में बच्चों के लिए भोजन बनाने का काम कर पांच बच्चों का पालन-पोषण किया। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने भागीरथी के सपनों को थमने नहीं दिया।
पगडंडियां बनीं पहला रनिंग ट्रैक
वाण गांव की चढ़ाई-उतराई वाली पगडंडियां ही भागीरथी का शुरुआती अभ्यास मैदान बनीं। पहाड़ की रोजमर्रा की जिंदगी ने उनके शरीर को कठिन परिस्थितियों में चलने और दौड़ने की आदत दी। यही वजह रही कि बाद में जब उन्होंने मैराथन को गंभीरता से अपनाया तो लंबी दूरी की थकान उनके हौसले को आसानी से नहीं तोड़ सकी। लगातार अभ्यास, अनुशासन और गति पर नियंत्रण ने उनकी क्षमता को निखारा।
ईरान में भी कर चुकी हैं भारत का प्रतिनिधित्व
भागीरथी की उपलब्धियों का दायरा अब राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं है। वह ईरान में आयोजित 42 किलोमीटर मैराथन में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में हुई कई मैराथन प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है। उनके कोच हिमाचल प्रदेश के सिरमौर निवासी और अंतरराष्ट्रीय मैराथन एथलीट सुनील शर्मा के अनुसार, भागीरथी कठिन प्रशिक्षण को पूरी प्रतिबद्धता के साथ पूरा कर रही हैं।
रजत के बाद स्वर्ण की तैयारी
हैदराबाद का रजत पदक भागीरथी के लिए मंजिल नहीं, बल्कि अगले लक्ष्य की सीढ़ी है। वह ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने और मैराथन में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सपना देख रही हैं। कोच सुनील शर्मा के मुताबिक, भागीरथी की सबसे बड़ी ताकत उनकी मेहनत और विपरीत परिस्थितियों में भी लगातार आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति है। वाण की पगडंडियों से शुरू हुई उनकी दौड़ अब अंतरराष्ट्रीय मंच और ओलंपिक की चोटी की ओर बढ़ रही है।

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