Dehradun, 07 May 2026 । उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब नई और गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक शोध में खुलासा हुआ है कि गुलदार के सबसे अधिक हमले जंगलों में नहीं, बल्कि गांवों से खेतों की ओर जाने वाली पगडंडियों पर हो रहे हैं। अध्ययन के अनुसार 61 प्रतिशत हमले खेतों तक पहुंचने वाले संकरे रास्तों पर दर्ज किए गए, जबकि 30 प्रतिशत घटनाएं घरों के आसपास हुईं। जंगलों के भीतर हमलों का आंकड़ा महज सात प्रतिशत पाया गया है।
वाइल्डलाइफ बुलेटिन में प्रकाशित इस अध्ययन को गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से जुड़े शोधकर्ताओं की टीम ने तैयार किया है। अध्ययन का नेतृत्व विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. दिनेश भट्ट ने किया। शोध में वर्ष 2011 से 2021 के बीच टिहरी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हुए गुलदार हमलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस दौरान 29 लोगों की मौत हुई, जबकि 77 लोग घायल हुए।
शोध में सामने आया कि जिन क्षेत्रों में खेतों तक पहुंचने के लिए झाड़ियों से घिरी संकरी पगडंडियों का इस्तेमाल होता है, वहां हमलों की संख्या अधिक रही। विशेषज्ञों के अनुसार महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रोजमर्रा के कार्यों के लिए इन्हीं रास्तों से गुजरते हैं, जिससे खतरा बढ़ जाता है।
अध्ययन ने एक और चिंता बढ़ाई है। अब गुलदार केवल रात में ही नहीं, बल्कि दिन के समय भी गांवों के आसपास सक्रिय दिखाई दे रहा है। अधिकांश घटनाएं दिन के समय दर्ज की गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में प्राकृतिक शिकार की कमी, बढ़ती आबादी और मानव बस्तियों के जंगलों की ओर विस्तार के कारण गुलदार आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ रहा है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि पगडंडियों के आसपास उगी झाड़ियों को हटाया जाए, रास्तों को चौड़ा किया जाए और संवेदनशील क्षेत्रों में बेहतर रोशनी की व्यवस्था की जाए।
लैंटाना झाड़ियां बढ़ा रहीं खतरा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि गांवों के आसपास तेजी से फैल रही लैंटाना झाड़ियां गुलदार के लिए सुरक्षित छिपने का स्थान बन रही हैं। खेतों और पगडंडियों के किनारे फैली ये घनी झाड़ियां अचानक हमलों की बड़ी वजह बन रही हैं।
खेतों की पगडंडियां बनीं गुलदार हमलों का सबसे बड़ा खतरा
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