Dehradun, 25 October 2026। उत्तराखंड के टिहरी जिले में हेंवल नदी को पुनर्जीवित करने की पहल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस मॉडल का उल्लेख किया। पहाड़ों में घटते जलप्रवाह और सूखते प्राकृतिक जलस्रोतों के बीच हेंवल नदी पुनर्जीवन अभियान जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण आजीविका को जोड़ने की मिसाल बनकर सामने आया है।
करीब 26 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में संचालित इस अभियान का उद्देश्य केवल नदी की धारा को बहाल करना नहीं, बल्कि उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र में जल उपलब्धता बढ़ाना है। वर्ष 2018-19 में तत्कालीन नरेंद्रनगर वन प्रभाग में आईएफएस अधिकारी धर्म सिंह मीणा के नेतृत्व में शुरू की गई इस पहल के तहत 126 प्राकृतिक जलस्रोतों और 28 गदेरों को पुनर्जीवित करने का काम किया गया।
अभियान में वर्षाजल संचयन, चाल-खाल निर्माण, चेकडैम बनाने, पुनर्भरण गड्ढे तैयार करने और स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने जैसे उपाय अपनाए गए। इन प्रयासों का उद्देश्य वर्षा के पानी को बहकर बर्बाद होने से रोकना, मिट्टी में नमी बनाए रखना और भूजल का पुनर्भरण बढ़ाना है। परियोजना के आकलनों के अनुसार, मूल्यांकित क्षेत्रों में जलस्रोतों के प्रवाह में करीब 60 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है।
जल संरक्षण के साथ आजीविका पर जोर
हेंवल नदी पुनर्जीवन मॉडल की खासियत यह है कि इसमें स्थानीय समुदायों को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है। इसके लिए 34 हेंवल धारा संरक्षण समितियां गठित की गईं, जिनके माध्यम से लोगों को जलस्रोतों की सुरक्षा और संरक्षण से जोड़ा गया। साथ ही डेयरी, मधुमक्खी पालन और पौधशाला जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर ग्रामीणों की आय बढ़ाने का प्रयास किया गया। परियोजना के अनुसार, डेयरी गतिविधियों से 500 से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं।
धर्म सिंह मीणा को मिला इको-वॉरियर अवार्ड
हेंवल नदी पुनर्जीवन के प्रयासों के लिए आईएफएस अधिकारी धर्म सिंह मीणा को इको-वॉरियर अवार्ड 2026 से सम्मानित किया गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में इस पहल का उल्लेख होने से उत्तराखंड में जल संरक्षण के स्थानीय प्रयासों को नई पहचान मिली है। यह मॉडल पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक जल संरचनाओं, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी के जरिए जल संकट से निपटने की संभावनाएं भी सामने रखता है।




