Dehradun, 30 May 2026: दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन से ठीक पहले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के लिए अपना दूसरा मौसमी पूर्वानुमान जारी कर दिया है। खास बात यह है कि मौसम विभाग अपने पहले अनुमान पर लगभग कायम नजर आ रहा है। ताजा पूर्वानुमान में देशभर में मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के 90 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है, जबकि अप्रैल में जारी पहले अनुमान में यह आंकड़ा 92 प्रतिशत बताया गया था। यानी दो महीने बाद जारी दूसरे अनुमान में केवल मामूली संशोधन किया गया है।
इससे स्पष्ट है कि मौसम विभाग शुरुआत से ही इस वर्ष मानसून के सामान्य से कुछ कमजोर रहने के संकेत दे रहा था। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कुल वर्षा औसत से कम रहने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में सूखे जैसी स्थिति बनेगी। मानसून के दौरान वर्षा का वितरण अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है और कई राज्यों में सामान्य या उससे अधिक बारिश भी दर्ज की जा सकती है।
आईएमडी के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में सामान्य वर्षा होने की संभावना है, जबकि देश के अधिकांश अन्य हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। ऐसे में कृषि क्षेत्र, जल संसाधन विभागों और बिजली उत्पादन एजेंसियों की नजरें मानसून की प्रगति पर टिकी हुई हैं।
क्या है LPA और क्यों है महत्वपूर्ण?
मौसम विभाग के पूर्वानुमानों में अक्सर इस्तेमाल होने वाला शब्द ‘लॉन्ग पीरियड एवरेज’ (LPA) आम लोगों के लिए तकनीकी लग सकता है। दरअसल, यह पिछले कई दशकों के औसत वर्षा आंकड़ों का मानक होता है। यदि किसी वर्ष बारिश 100 प्रतिशत LPA के आसपास रहती है तो उसे सामान्य मानसून माना जाता है।
सरल भाषा में समझें तो यदि किसी क्षेत्र में औसतन 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है और अनुमान 90 प्रतिशत LPA का है, तो वहां लगभग 90 सेंटीमीटर बारिश होने की संभावना मानी जाती है। यानी सामान्य से करीब 10 प्रतिशत कम वर्षा।
खेती और जल भंडारण पर असर की आशंका
भारत की खरीफ कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी फसलों की बुआई के लिए समय पर और पर्याप्त वर्षा बेहद जरूरी होती है। यदि कई क्षेत्रों में बारिश कम रहती है तो किसानों की सिंचाई लागत बढ़ सकती है और भूजल पर दबाव भी बढ़ेगा।
इसके अलावा जलाशयों, बांधों और पेयजल स्रोतों की स्थिति भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। यही वजह है कि मानसून का यह पूर्वानुमान केवल कृषि क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि जल प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन और अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की सफलता केवल कुल बारिश की मात्रा से नहीं आंकी जाती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वर्षा सही समय पर और सही क्षेत्रों में कितनी होती है। ऐसे में आने वाले सप्ताहों में मानसून की चाल और क्षेत्रवार वर्षा के आंकड़े देश के लिए बेहद अहम साबित होंगे।
IMD का दूसरा मानसून पूर्वानुमान जारी, इस बार थम गयी Monsoon की रफ्तार
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