Dehradun, 16 july 2026। उत्तराखंड में धान उत्पादन को अधिक लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा नवाचार शुरू हुआ है। अब प्रदेश में पारंपरिक रोपाई के बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक से बिना रोपाई धान की खेती की जा रही है। जलागम विभाग की उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना के तहत हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिले में 66 हेक्टेयर क्षेत्र में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे खेती की लागत घटेगी, पानी की बचत होगी, उत्पादन बेहतर होगा और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा।
विश्व बैंक वित्तपोषित इस परियोजना के तहत दोनों जिलों की 10 से अधिक ग्राम पंचायतों के 90 से ज्यादा किसानों को डीएसआर तकनीक से जोड़ा गया है। किसानों को आधुनिक कृषि पद्धति का प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि नई तकनीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके।
इस परियोजना में केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक तकनीकी सहयोगी की भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के अन्य धान उत्पादक क्षेत्रों में भी डीएसआर तकनीक का विस्तार किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक धान रोपाई में खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, जिससे मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अधिक होता है। डीएसआर तकनीक में सीधे खेत में बीज बोए जाते हैं, जिससे पानी की आवश्यकता कम होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
डीएसआर तकनीक के प्रमुख फायदे
रोपाई का खर्च समाप्त होने से खेती की लागत कम।
20 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत।
मजदूरों पर निर्भरता घटती है।
फसल समय पर तैयार होती है और उपज बेहतर मिलने की संभावना।
मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होने से पर्यावरण संरक्षण में मदद।
कोट
“हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की कुछ ग्राम पंचायतों में फिलहाल डीएसआर तकनीक का प्रायोगिक उपयोग किया जा रहा है। नियमित अंतराल पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मॉनिटरिंग भी की जा रही है, ताकि पारंपरिक खेती और डीएसआर तकनीक के उत्सर्जन के अंतर का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके।”
– दिलीप जावलकर, सचिव, जलागम विभाग




