Dehradun, 22 August 2026। हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के साथ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बन रही ग्लेशियर झीलें उत्तराखंड के लिए नई आपदा की चुनौती बन रही हैं। ग्लेशियर से निकलने वाला पानी प्राकृतिक बांध के पीछे जमा होकर विशाल झील का रूप ले सकता है। यदि किसी कारण से यह प्राकृतिक बांध टूटता है तो झील का पानी अचानक तेजी से नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) का खतरा पैदा होता है। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के अध्ययन में प्रदेश में ऐसी 13 संवेदनशील झीलों को चिह्नित किया गया है। इनमें सर्वाधिक छह झीलें सीमांत जिले पिथौरागढ़ में हैं। खास बात यह है कि इनमें चार झीलों को ‘ए’ श्रेणी में रखा गया है।
पिथौरागढ़ में जोखिम वाली छह झीलों में मबांग लेक, स्यांतयांकी लेक, प्युनग्रू लेक और एक अनाम झील को ‘ए’ श्रेणी में रखा गया है, जबकि दो झीलें ‘बी’ श्रेणी की हैं। इनमें अधिकांश झीलें दारमा, लासर यांग्ती और कुथी यांग्ती जैसी ऊंची हिमालयी घाटियों में स्थित हैं। इन क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलने के कारण भारी बारिश, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और बर्फ या चट्टानों के झील में गिरने जैसी घटनाएं प्राकृतिक बांध की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
ग्लोफ की स्थिति बनने पर झील का पानी अचानक नीचे की ओर बहता है और नदी घाटियों में बाढ़ का वेग कई गुना बढ़ सकता है। सीमांत क्षेत्रों में इसका खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इन झीलों के नीचे कई स्थानों पर आबादी के साथ सड़कें, पुल और अन्य महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग मौजूद हैं। ऐसे में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में झीलों की लगातार निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन आपदा जोखिम कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है।
चमोली में भी चार झीलें जोखिम के दायरे में
चमोली जिले में भी चार ग्लेशियर झीलों को जोखिम वाली श्रेणी में चिह्नित किया गया है। इनमें सरस्वती लेक, दो अनाम झीलें और केदार ताल शामिल हैं। इन चारों में एक झील को ‘ए’, एक को ‘बी’ और दो को ‘सी’ श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा चमोली की वसुधारा ताल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। सर्वेक्षण के माध्यम से झील की गहराई, जल क्षमता और ग्लेशियोलॉजिकल स्थिति से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई गई है।
चार झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन पूरा
राज्य में अब तक चार ग्लोफ संभावित झीलों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। इनमें चमोली की वसुधारा ताल और पिथौरागढ़ की मबांग, स्यांतयांकी तथा प्युनग्रू झील शामिल हैं। वसुधारा ताल में बाथीमेट्री के साथ ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन किया गया है। वहीं पिथौरागढ़ की तीनों झीलों में भी ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन और विशेष वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया गया है। इन अध्ययनों से झीलों की संरचना, जल क्षमता और संभावित जोखिम को समझने में मदद मिलेगी तथा भविष्य में निगरानी और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में वैज्ञानिक आधार उपलब्ध होगा।




