Dehradun, 22 August 2026। उत्तराखंड में खेती के क्षेत्रफल को लेकर सकारात्मक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। वर्ष 2022-23 और 2024-25 के आंकड़ों की तुलना में राज्य के 13 जिलों में से सात जिलों में परती भूमि का रकबा घटा है। इसका मतलब है कि लंबे समय से खेती से बाहर पड़ी जमीन का एक हिस्सा फिर कृषि उपयोग में आने लगा है। राज्य में कुल परती भूमि 2,15,982 हेक्टेयर से घटकर 2,08,085 हेक्टेयर रह गई। दो वर्षों में 7,897 हेक्टेयर परती भूमि कम होना कृषि क्षेत्र के लिए उम्मीद जगाने वाला संकेत माना जा रहा है।
सर्वाधिक कमी पौड़ी में दर्ज
परती भूमि में सबसे बड़ी कमी पौड़ी जिले में दर्ज की गई। वर्ष 2022-23 में यहां 61,122 हेक्टेयर भूमि परती थी, जो 2024-25 में घटकर 55,320 हेक्टेयर रह गई। इस तरह 5,802 हेक्टेयर भूमि दोबारा कृषि उपयोग में आने के संकेत मिले हैं। हरिद्वार में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई, जहां परती भूमि 12,624 से घटकर 9,672 हेक्टेयर रह गई। यानी यहां 2,952 हेक्टेयर की कमी आई।
टिहरी में परती भूमि 25,183 से घटकर 22,701 हेक्टेयर, चंपावत में 16,965 से घटकर 14,869 हेक्टेयर और देहरादून में 23,947 से घटकर 22,884 हेक्टेयर रह गई। पिथौरागढ़ में यह आंकड़ा 15,187 से घटकर 14,703 हेक्टेयर और अल्मोड़ा में 26,854 से घटकर 26,447 हेक्टेयर हुआ है।
पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन, सिंचाई की सीमित सुविधा, बढ़ती कृषि लागत और जंगली जानवरों से फसलों को होने वाले नुकसान के कारण कृषि भूमि के परती रहने की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। ऐसे में सात जिलों में परती भूमि का घटना महत्वपूर्ण बदलाव है। हालांकि अब चुनौती इन जमीनों को लगातार खेती के उपयोग में बनाए रखने की है। इसके लिए सिंचाई सुविधाओं, बाजार, फसल सुरक्षा और किसानों को लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा।
छह जिलों में बढ़ी परती जमीन
राज्य के सभी जिलों में परती भूमि घटने का रुझान नहीं रहा। छह जिलों में इसका रकबा बढ़ा है। ऊधम सिंह नगर में परती भूमि 9,487 से बढ़कर 13,231 हेक्टेयर हो गई, यानी 3,744 हेक्टेयर की वृद्धि हुई। चमोली में यह 3,880 से बढ़कर 5,376 हेक्टेयर और रुद्रप्रयाग में 1,806 से बढ़कर 2,558 हेक्टेयर हो गई।
बागेश्वर में परती भूमि 4,402 से बढ़कर 5,024 हेक्टेयर, नैनीताल में 10,175 से बढ़कर 10,700 हेक्टेयर और उत्तरकाशी में 4,350 से बढ़कर 4,600 हेक्टेयर दर्ज हुई।
मिलेट और औद्यानिकी से मिल रहा सहारा
कृषि निदेशक दिनेश कुमार के अनुसार, मिलेट नीति के तहत मंडुवा समेत अन्य मोटे अनाजों का क्षेत्रफल बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ सब्जी, चाय और औद्यानिकी गतिविधियों के लिए भी परती भूमि का उपयोग किया जा रहा है। उनका कहना है कि परती भूमि में आई कमी इस बात का संकेत है कि किसान दोबारा खेती की ओर लौट रहे हैं। यदि सिंचाई, बाजार और फसल सुरक्षा जैसी सुविधाओं को और मजबूत किया जाए तो आने वाले वर्षों में यह रुझान और बेहतर हो सकता है।




