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Himalaya Ki Awaj > Blog > उत्तराखंड > मानसून में रणनीति बदल रहा गुलदार, गर्मियों में जंगल में बाघ का खतरा ज्यादा 
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मानसून में रणनीति बदल रहा गुलदार, गर्मियों में जंगल में बाघ का खतरा ज्यादा 

Web Editor
Last updated: 2026/08/21 at 3:52 PM
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4 Min Read
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Dehradun, 21 August 2026। उत्तराखंड के जंगलों में खतरा हर मौसम में एक जैसा नहीं रहता। बारिश आते ही खेतों और बस्तियों के आसपास गुलदार की सक्रियता बढ़ जाती है, जबकि गर्मियों में जंगल जाने वाले ग्रामीणों का सामना बाघ से होने का खतरा बढ़ जाता है। 20 वर्षों के आंकड़ों के अध्ययन ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की इस बदलती तस्वीर को सामने रखा है। अध्ययन में न केवल गुलदार और बाघ के हमलों का अलग-अलग मौसम में अलग पैटर्न सामने आया, बल्कि समय के साथ दोनों प्रजातियों के हमलों में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है।

पालमपुर के शोधकर्ता अमनदीप राठी ने सेवानिवृत्त मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डॉ. राजीव भरतरी और भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन डॉ. वाईवी झाला के मार्गदर्शन में वर्ष 2000 से 2019 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें उत्तराखंड में हुए 132 बाघ और 1,914 गुलदार हमलों को शामिल किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल वन्यजीवों की संख्या से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, बल्कि मौसम, मानव गतिविधियों और क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां भी इसकी बड़ी वजह हैं।

बारिश में खेत बनते हैं गुलदार की छिपने की जगह

गुलदार को बेहद अनुकूलनशील और मायावी वन्यजीव माना गया है। अध्ययन के अनुसार राज्य में औसतन 98 गुलदार हमले प्रतिवर्ष दर्ज हुए, जिनमें 22.3 प्रतिशत जानलेवा रहे। मानसून के दौरान खेतों में फसल घनी हो जाती है। यही घना आवरण गुलदार को छिपने का बेहतर मौका देता है और इंसानों के साथ अचानक आमना-सामना बढ़ जाता है।

गुलदार के हमले केवल जंगल तक सीमित नहीं रहे। खेतों, गांवों और बस्तियों के आसपास भी इनकी घटनाएं अधिक सामने आईं। खासकर कम और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मानव-गुलदार संघर्ष का खतरा अधिक पाया गया।

गर्मियों में जंगल और बाघ का आमना-सामना

बाघों के औसतन सात हमले प्रतिवर्ष दर्ज किए गए, लेकिन इनमें 34.8 प्रतिशत घातक रहे। गर्मियों में ग्रामीण घास, लकड़ी और वन उपज जुटाने के साथ वानिकी संबंधी कामों के लिए ज्यादा संख्या में जंगल का रुख करते हैं। यही बढ़ी हुई आवाजाही बाघ से टकराव की आशंका को बढ़ाती है।

बाघों के हमले मुख्य रूप से जंगलों, संरक्षित क्षेत्रों और कम आबादी वाले इलाकों में दर्ज हुए। अध्ययन में हमलों की बढ़ती आवृत्ति को बाघों की बढ़ती आबादी से भी जोड़ा गया है।

बच्चों और महिलाओं पर ज्यादा गंभीर असर

अध्ययन में सामने आया कि दोनों वन्यजीवों के हमलों में वयस्क पुरुष सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, लेकिन बच्चों और महिलाओं पर हुए हमले अपेक्षाकृत अधिक घातक रहे। ऐसे में संवेदनशील इलाकों में इनके लिए विशेष सुरक्षा उपाय जरूरी बताए गए हैं।

शोध में जंगल पर ग्रामीणों की निर्भरता कम करने, सुरक्षित घर, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ाने तथा वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है। मवेशियों को सुरक्षित बाड़ों में रखने, स्टाल फीडिंग अपनाने और जंगल से सटे खेतों में समूह बनाकर दिन के समय काम करने जैसे उपायों पर भी जोर दिया गया है।

मौसम के हिसाब से बदले रणनीति

अध्ययन का अहम संदेश यही है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए एक जैसी रणनीति पर्याप्त नहीं होगी। मानसून में खेतों और बस्तियों के आसपास गुलदार की निगरानी बढ़ाने और गर्मियों में जंगल जाने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। संवेदनशील क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार फेंसिंग और बच्चों-बुजुर्गों की विशेष निगरानी भी कारगर कदम साबित हो सकती है।

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