Dehradun, 16 october 2026। जिस इलाके में कभी बाढ़ तबाही मचाती है, वहां कुछ समय बाद सूखे का संकट भी गहरा सकता है। देश में बाढ़ और सूखे का खतरा अब अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ समझने की जरूरत है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं के अध्ययन में सामने आया है कि देश के कई जिलों में बाढ़ और सूखे, दोनों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है। इससे इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका, जल संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
नेचर पोर्टफोलियो की शोध पत्रिका npj Natural Hazards में प्रकाशित इस अध्ययन में वर्ष 2001 और 2011 के दौरान देश के 591 जिलों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने सामाजिक, जनसांख्यिकीय और बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़ों के आधार पर बाढ़ और सूखे के जोखिम को समझने के लिए मल्टी-हैजार्ड वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (एमएचवीआई) तैयार किया।
अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2011 तक देश के पांच में से एक से अधिक जिले बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में थे, जबकि करीब पांच में से एक जिले में सूखे का खतरा अधिक था। वहीं, 10 फीसदी से अधिक जिले ऐसे पाए गए, जहां कई तरह के खतरों के प्रति संवेदनशीलता ज्यादा थी।
यूपी-बिहार समेत कई राज्यों में बढ़ी चिंता
शोध में ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड के विभिन्न जिलों में बाढ़ और सूखे की संवेदनशीलता बढ़ने के संकेत मिले। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के जिले दोनों खतरों के लिहाज से अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल रहे।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रो. मोहित प्रकाश मोहंती के अनुसार, बाढ़ और सूखे को अक्सर अलग-अलग आपदाओं के रूप में देखा जाता है, जबकि इनका असर एक ही सामाजिक और भौतिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
जिलेवार योजना बनाने पर जोर
शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल राज्य स्तर के आंकड़ों से स्थानीय समस्याओं की सही तस्वीर सामने नहीं आती। इसलिए जिलेवार आकलन के आधार पर आपदा प्रबंधन, जल संरक्षण, बुनियादी ढांचे और जलवायु अनुकूलन की योजनाएं तैयार करना जरूरी है। अध्ययन को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने सहयोग दिया। हालांकि, यह सूचकांक संवेदनशीलता का आकलन करता है, किसी आपदा के नुकसान की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।




