Dehradun, 04 August 2026। उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए वन विभाग अब प्रकृति को ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बनाने जा रहा है। जंगलों की सीमाओं पर कैक्टस, करौंदा, बबूल, रिंगाल, बुरांश और अन्य स्थानीय कांटेदार पौधों की जैविक बाड़ (बायोफेंसिंग) विकसित की जाएगी, ताकि हाथी, गुलदार, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों और खेतों तक न पहुंच सकें। विभाग ने राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार तराई से लेकर उच्च हिमालय तक अलग-अलग पौधों का चयन कर लिया है।
वन विभाग का मानना है कि बीते कुछ वर्षों में वन्यजीवों की आबादी वाले क्षेत्रों से गांवों की ओर आवाजाही बढ़ने के कारण फसलों को नुकसान, पशुओं पर हमले और जनहानि की घटनाओं में इजाफा हुआ है। ऐसे में केवल तारबाड़ या कंक्रीट की दीवारों के बजाय पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ प्राकृतिक अवरोध तैयार किए जाएंगे।
योजना के तहत तराई-भाबर क्षेत्र में कैक्टस, लैमनग्रास और अन्य कांटेदार प्रजातियां लगाई जाएंगी। मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में करौंदा, बेंत, रिंगाल, बुरांश और माल्टा की जैविक बाड़ विकसित होगी, जबकि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बबूल, हिंसालू और स्थानीय झाड़ियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
जहां बायोफेंसिंग संभव नहीं होगी, वहां मधुमक्खी बाड़ (बी-फेंसिंग) तैयार की जाएगी। वन सीमा पर मधुमक्खियों के बक्से लगाए जाएंगे, क्योंकि हाथी मधुमक्खियों की गतिविधियों से दूरी बनाए रखते हैं। कार्बेट टाइगर रिजर्व में इस मॉडल के सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद इसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी लागू करने की तैयारी है।
इसके अलावा राजाजी टाइगर रिजर्व से सटे गांवों में किसानों को लैमनग्रास और मिंट जैसी सुगंधित फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इनकी गंध कई वन्यजीवों को खेतों से दूर रखने में सहायक मानी जाती है। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ फसलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी।
अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) विवेक पांडेय ने बताया कि बायोफेंसिंग के लिए चुनी गई प्रजातियां स्थानीय पारिस्थितिकी, वन्यजीवों के व्यवहार और ग्रामीणों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। उन्होंने कहा कि यदि यह मॉडल सफल रहा तो इसे चरणबद्ध तरीके से राज्य के सभी संवेदनशील वन क्षेत्रों में लागू किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित हो सकेगा।
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