Dehradun 05 September 2026। ऊंचे हिमालय में बनी हिमनद झीलों के अचानक फटने से पैदा होने वाले खतरे से निपटने के लिए उत्तराखंड अब अत्याधुनिक चेतावनी तंत्र तैयार कर रहा है। चमोली जिले की अति संवेदनशील वसुंधरा ताल में इसी माह ग्लोफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) मॉनीटरिंग एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। मौसम अनुकूल रहा तो 20 से 30 सितंबर के बीच सिस्टम की स्थापना का लक्ष्य है। इसके बाद राज्य की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों को भी इस तकनीक से जोड़ा जाएगा।
इस प्रणाली की खासियत यह है कि झील में होने वाली असामान्य गतिविधि का संकेत एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम तक पहुंच सकेगा। झील में हिमखंड गिरने, जलस्तर में अचानक वृद्धि होने अथवा प्राकृतिक बांध के कमजोर होने जैसी घटनाओं को सेंसर रिकॉर्ड करेंगे। सेंसर से प्राप्त आंकड़े सैटेलाइट के माध्यम से भेजे जाएंगे। घटनाक्रम की दृश्य पुष्टि के लिए झील क्षेत्र में कैमरे भी लगाए जाएंगे।
ऐसे में खतरे के शुरुआती संकेत मिलते ही संबंधित तंत्र सक्रिय हो सकेगा और निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई शुरू की जा सकेगी।
20 किमी नीचे तक आठ-दस मिनट में पहुंच सकता है पानी
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वसुंधरा ताल में ग्लेशियल झील आउटबर्स्ट फ्लड की स्थिति बनती है तो झील से निकलने वाला पानी और मलबा शुरुआती करीब 20 किलोमीटर क्षेत्र तक आठ से दस मिनट में पहुंच सकता है। इसके बाद भू-भाग और नदी की ढाल के अनुसार बाढ़ का प्रवाह आगे बढ़ेगा और विभिन्न निचले क्षेत्रों तक पहुंचने में आधा घंटा, एक घंटा या उससे अधिक समय लग सकता है। ऐसे में मिलने वाला शुरुआती एक-दो मिनट का अलर्ट आपदा प्रबंधन के लिहाज से बेहद अहम होगा।
चौबीसों घंटे मौसम पर भी रहेगी नजर
अर्ली वार्निंग सिस्टम के साथ वसुंधरा ताल में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन भी स्थापित किया जाएगा। इससे तापमान, वर्षा, बर्फबारी और अन्य मौसम संबंधी गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। मौसम और झील के व्यवहार से जुड़े आंकड़ों को एक साथ देखने से जोखिम का आकलन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
तीन साल में विकसित हुई तकनीक
हिमनद झीलों की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली इस प्रणाली को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की ने करीब तीन वर्ष के अनुसंधान और तकनीकी विकास के बाद तैयार किया है। वसुंधरा ताल में सिस्टम की स्थापना के बाद अप्रैल-मई तक चार अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों में इसे स्थापित करने की योजना है। इसके बाद जोखिम श्रेणी में आने वाली आठ अन्य झीलों को भी चरणबद्ध तरीके से निगरानी तंत्र से जोड़ा जाएगा।
दून या रुड़की में होगा कंट्रोल रूम
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, सिस्टम का केंद्रीय कंट्रोल रूम सीबीआरआई रुड़की अथवा देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में स्थापित करने पर विचार किया जा रहा है। इसे राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से भी जोड़ा जाएगा। इससे झील से प्राप्त संकेतों का तत्काल विश्लेषण कर संबंधित जिलों और बचाव तंत्र को अलर्ट किया जा सकेगा।




