Dehradun, 2 May 2026। उत्तराखंड में बीते पांच वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र में गंभीर संकट उभरकर सामने आया है। राज्य पलायन आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 63,291 हेक्टेयर से अधिक भूमि बंजर हो चुकी है। यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी गई है, जो खेती के सिकुड़ते दायरे और बढ़ते पलायन के बीच गहरे संबंध को उजागर करती है।
रिपोर्ट के अनुसार बंजर भूमि का सबसे अधिक प्रभाव पर्वतीय जिलों में देखा गया है। पौड़ी गढ़वाल में 19,744 हेक्टेयर भूमि बंजर हो चुकी है, जो राज्य में सबसे अधिक है। इसके बाद अल्मोड़ा में 15,887 हेक्टेयर और टिहरी गढ़वाल में 8,654 हेक्टेयर भूमि खेती से बाहर हो गई है। इन तीनों जिलों में ही कुल बंजर भूमि का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केंद्रित है। अन्य पर्वतीय जिलों—बागेश्वर, चंपावत, पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी—में भी खेती का दायरा लगातार सिमट रहा है, जबकि ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान, सिंचाई सुविधाओं की कमी, छोटे व बिखरे खेत, बाजार तक सीमित पहुंच और युवाओं का पलायन खेती छोड़ने के प्रमुख कारण हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमशक्ति की कमी भी बढ़ रही है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के अनुसार उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत अत्यधिक जोखिम श्रेणी में हैं, जबकि चमोली और पौड़ी उच्च जोखिम में शामिल हैं।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सिंचाई विस्तार, फसल सुरक्षा, आधुनिक तकनीक और बाजार से बेहतर जुड़ाव के साथ स्थानीय रोजगार बढ़ाने पर ध्यान देना होगा, अन्यथा यह संकट और गहरा सकता है।
उत्तराखंड में 5 साल में 63 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर, पलायन से गहराया कृषि संकट
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