गंगोत्री घाटी में हाईटेक निगरानी की तैयारी, आपदा से पहले मिलेगा अलर्ट
Dheradun,18 May 2026। आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली गंगोत्री घाटी में अब आधुनिक तकनीक के सहारे निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाएगी। जिला प्रशासन ने घाटी के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (ईडब्ल्यूएस) स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस सिस्टम के जरिए भूस्खलन, भारी वर्षा, पहाड़ियों में भू-गतिविधियों और नदियों के जलस्तर में होने वाले अचानक बदलाव की समय रहते जानकारी मिल सकेगी।
प्रशासन ने गंगोत्री धाम के साथ केदारताल, हर्षिल और धराली क्षेत्र को इस परियोजना के लिए चिन्हित किया है। ये सभी इलाके भू-संवेदनशील श्रेणी में आते हैं, जहां मानसून के दौरान भूस्खलन और बाढ़ का खतरा लगातार बना रहता है। बीते वर्षों में यहां कई बार प्राकृतिक आपदाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
विशेष रूप से पिछले वर्ष पांच अगस्त को धराली क्षेत्र में आई आपदा के बाद प्रशासन ने घाटी में स्थायी निगरानी तंत्र की आवश्यकता को गंभीरता से महसूस किया। उस दौरान अचानक जलस्तर बढ़ने और पहाड़ियों से मलबा आने के कारण हालात बिगड़ गए थे। इसके बाद विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों ने तकनीकी आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया।
जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी शार्दूल गुसाईं ने बताया कि अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने का प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। मंजूरी मिलते ही चयनित क्षेत्रों में उपकरण लगाने और निगरानी नेटवर्क तैयार करने का काम शुरू कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मानसून सीजन के दौरान यह प्रणाली आपदा प्रबंधन के लिए बेहद प्रभावी साबित होगी।
प्रस्तावित सिस्टम गंगा और उसकी सहायक नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी करेगा। साथ ही आसपास की पहाड़ियों में भू-स्खलन, मिट्टी खिसकने और असामान्य भू-वैज्ञानिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जाएगी। किसी भी संभावित खतरे के संकेत मिलते ही संबंधित विभागों और प्रशासन को तुरंत अलर्ट भेजा जाएगा, ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से बढ़ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने, अनियमित बारिश और कमजोर होती पहाड़ियों के कारण आपदाओं की आशंका पहले की तुलना में अधिक हो गई है। वहीं चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ती आवाजाही भी संवेदनशील क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव बना रही है। ऐसे में गंगोत्री घाटी में अर्ली वार्निंग सिस्टम को सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।




