Dehradun, 12 August 2026। खनन और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले तेजाबी पानी को साफ करने के साथ उसमें मौजूद मूल्यवान तत्वों को वापस हासिल करने की दिशा में आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा विशेष चुंबकीय नैनोकम्पोजिट विकसित किया है, जो बेहद अम्लीय पानी में भी काम कर सकता है। यह सामग्री पानी में मौजूद रेडियोधर्मी यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को अलग करने में सक्षम है। तकनीक के आगे विकसित होने पर औद्योगिक कचरे से प्रदूषित पानी की सफाई के साथ महत्वपूर्ण खनिजों की दोबारा प्राप्ति का रास्ता खुल सकता है।
खनन और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं के दौरान निकलने वाला पानी अत्यधिक अम्लीय हो सकता है। ऐसे पानी में यूरेनियम के अलावा कई दुर्लभ मृदा तत्व भी मौजूद हो सकते हैं। इन तत्वों का इस्तेमाल मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टर्बाइन, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों में किया जाता है। चुनौती यह है कि सामान्य सामग्री तेजाबी वातावरण में जल्दी खराब हो जाती है और लंबे समय तक प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाती।
तेजाब से बचाने के लिए बनाई सुरक्षात्मक परत
इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने विशेष चुंबकीय नैनोकम्पोजिट तैयार किया है। यह बेहद छोटे कणों से बनी सामग्री है, जिसे पानी में मिलाने के बाद चुंबक की सहायता से आसानी से अलग किया जा सकता है। इसके सक्रिय कणों के ऊपर सिलिका की मजबूत परत चढ़ाई गई है। यह परत तेजाब से सुरक्षा कवच की तरह काम करती है और सामग्री को अत्यधिक अम्लीय वातावरण में भी सक्रिय बनाए रखने में मदद करती है।
इस तकनीक की खासियत केवल प्रदूषित पानी से यूरेनियम और दुर्लभ तत्वों को हटाना नहीं है। शोध का उद्देश्य इन मूल्यवान तत्वों को पानी से अलग करने के बाद दोबारा उपयोग के योग्य बनाना भी है। इससे औद्योगिक और खनन कचरे को केवल प्रदूषण का स्रोत मानने के बजाय उसमें मौजूद उपयोगी संसाधनों को वापस हासिल करने की संभावना बढ़ सकती है।
एक किलो सामग्री से 370 ग्राम तक तत्व हटाने की क्षमता
प्रयोगशाला परीक्षणों में एक किलोग्राम नैनोमैटेरियल से 370 ग्राम तक यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाने और वापस हासिल करने की क्षमता सामने आई। सामान्य परिस्थितियों में सामग्री यूरेनियम और दुर्लभ तत्वों दोनों को पकड़ सकती है। वहीं, अत्यधिक अम्लीय पानी में इसने विशेष रूप से यूरेनियम को चुनकर अलग करने की क्षमता दिखाई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, सामग्री की दोबारा इस्तेमाल करने की क्षमता भी उत्साहजनक रही। लगातार पांच बार इस्तेमाल किए जाने के बाद भी यूरेनियम हटाने की इसकी क्षमता लगभग बरकरार रही। इससे भविष्य में इसे बार-बार इस्तेमाल करने वाली तकनीक के रूप में विकसित करने की संभावना बनती है।
सीवेज स्लज से बने बायोचार का इस्तेमाल
शोध की एक और खासियत इसमें अपशिष्ट सामग्री का उपयोग है। परियोजना पर काम कर रहीं पीएचडी शोधार्थी भाव्या स्वामी के अनुसार, नैनोकम्पोजिट तैयार करने में अपशिष्ट सीवेज स्लज से तैयार बायोचार का इस्तेमाल किया गया है। यानी एक ऐसे कचरे, जिसका निपटान खुद पर्यावरणीय चुनौती है, उसे एक उपयोगी तकनीक विकसित करने में इस्तेमाल किया गया।
आईआईटी रुड़की के प्रो. नितिन खंडेलवाल ने बताया कि अत्यधिक अम्लीय पानी में लंबे समय तक काम करने वाली सामग्री तैयार करना इस शोध की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। सिलिका की सुरक्षात्मक परत ने सक्रिय कणों को तेजाब के प्रभाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मोबाइल और ई-वाहन उद्योग के लिए भी उपयोगी
दुर्लभ मृदा तत्व आधुनिक तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनका इस्तेमाल स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अलावा रक्षा क्षेत्र में भी होता है। ऐसे में औद्योगिक और खनन अपशिष्ट से इन तत्वों को वापस हासिल करने की तकनीक विकसित होने पर संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि फिलहाल यह तकनीक प्रयोगशाला स्तर के परीक्षणों में सफल रही है। बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग से पहले इसके प्रदर्शन, लागत, सुरक्षा और अलग-अलग प्रकार के औद्योगिक पानी में प्रभावशीलता का विस्तृत परीक्षण जरूरी होगा।
जहरीले तेजाबी पानी से यूरेनियम निकालेगा आईआईटी रुड़की का नैनो मैटेरियल
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