Dehradun, 12 August 2026। उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर करीब 21 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर ओजोन की असामान्य रूप से मोटी परत मिलने से वैज्ञानिक हैरान हैं। सामान्य से कहीं अधिक मात्रा में मौजूद यह ओजोन परत एक दिन से अधिक समय तक बनी रही। अब वैज्ञानिक यह पता लगाने में जुटे हैं कि इतनी अधिक ओजोन अचानक इस क्षेत्र में कैसे पहुंची और ऊपरी वायुमंडल में इतने लंबे समय तक कैसे टिकी रही।
इस अध्ययन में नैनीताल स्थित आर्यभट्ट अनुसंधान विज्ञान संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा और डॉ. समरेश भट्टाचार्य भी शामिल रहे। अध्ययन के दौरान एरीज में स्थापित स्वदेशी 206.5 मेगाहर्ट्ज स्ट्रैटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर (एसटी) रडार से प्राप्त आंकड़ों ने ऊपरी वायुमंडल में हवा की गतिविधियों को समझने में अहम भूमिका निभाई। यह रडार धरती से कई किलोमीटर ऊपर चल रही हवाओं की गति, दिशा और ऊपर-नीचे होने वाली गतिविधियों को मापने में मदद करता है।
दूसरे क्षेत्र से बहकर आई ओजोन
वैज्ञानिकों ने मौसम गुब्बारों, रडार, उपग्रहों और कंप्यूटर आधारित वायुमंडलीय मॉडलों से मिले आंकड़ों का संयुक्त विश्लेषण किया। अध्ययन में संकेत मिला कि ओजोन की यह असामान्य परत स्थानीय स्तर पर अचानक बनने के कारण नहीं बनी। बल्कि ओजोन से भरपूर हवा दूसरे क्षेत्र से बहकर उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर पहुंची और वहां जमा हो गई।
इसके बाद ऊपरी वायुमंडल में हवा की लगातार नीचे की ओर गति और दबाव में बदलाव ने ओजोन को अपेक्षाकृत मोटी परत के रूप में केंद्रित करने में भूमिका निभाई। यानी इस घटना के पीछे ओजोन बनने के बजाय उसका एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में परिवहन प्रमुख कारण रहा।
एरीज के रडार से मिली अहम जानकारी
धरती से 20 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर हवा की गतिविधियों को सीधे समझना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में एरीज के एसटी रडार से मिले आंकड़े महत्वपूर्ण साबित हुए। रडार ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि उस दौरान ऊपरी वायुमंडल में हवाएं किस दिशा में और किस गति से आगे बढ़ रही थीं तथा हवा की ऊर्ध्वाधर गतिविधि कैसी थी।
रडार के आंकड़ों को उपग्रह और मौसम गुब्बारों से प्राप्त जानकारी के साथ मिलाने पर वैज्ञानिकों को ओजोन की असामान्य परत बनने की प्रक्रिया समझने में मदद मिली।
अब मौसम और मानसून पर असर की जांच
वैज्ञानिकों के लिए अगला सवाल इस असामान्य ओजोन परत के प्रभाव को लेकर है। विशेषज्ञ अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसी घटनाओं का मौसम, मानसून और जलवायु की प्रक्रियाओं से क्या संबंध है। साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि इस तरह की ओजोन परत कितनी बार बनती है और क्या इसके पीछे कोई विशेष मौसमी या वायुमंडलीय परिस्थिति जिम्मेदार है।
ऊपरी वायुमंडल में ओजोन की आवाजाही केवल ओजोन परत के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इससे वायुमंडल में बड़े पैमाने पर होने वाले हवा के परिवहन को भी समझा जा सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इस घटना को भारतीय मौसम और जलवायु विज्ञान के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रहे हैं।




