Dehradun, 25 September 2026। बाढ़ और बदलते मौसम की चुनौती के बीच अब ऐसे आशियाने तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है, जो सिर्फ सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि बाढ़, तेज बारिश और अन्य आपदाओं का भी सामना कर सकें। इसी दिशा में सीएसआईआर-सीबीआरआई, रुड़की के वैज्ञानिकों ने असम के बाढ़ प्रभावित गांवों में सुरक्षित और टिकाऊ आवास की तकनीक साझा की है। जोरहाट जिले के तिताबोर स्थित जुनाकीमंडल गांव में वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों को कम लागत में आपदा-रोधी घर बनाने और मौजूदा मकानों को मजबूत करने के उपाय बताए।
सीएसआईआर स्मार्ट विलेज मिशन के तहत पहुंची वैज्ञानिकों की टीम ने बाढ़ से प्रभावित आवासीय भवनों, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और सामुदायिक सुविधाओं का सर्वे किया। इस दौरान मकानों में हुई संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक क्षति का आकलन किया गया। कमजोर हिस्सों की पहचान कर उनकी मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण के तरीके भी ग्रामीणों को समझाए गए।
वैज्ञानिकों का फोकस बाढ़ के बाद क्षतिग्रस्त घरों की मरम्मत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि बदलते मौसम के दौर में भवन निर्माण की ऐसी तकनीक अपनाना जरूरी है, जिससे भविष्य में आपदा आने पर जान-माल का नुकसान कम किया जा सके। स्थानीय संसाधनों और उपलब्ध सामग्री के इस्तेमाल से कम लागत में मजबूत आवास तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया।
‘आवास सक्षम’ कार्यक्रम के तहत 150 से अधिक ग्रामीणों और पीएमएवाई-जी लाभार्थियों को सुरक्षित, किफायती और टिकाऊ आवास तकनीकों की जानकारी दी गई। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र की जरूरतों को देखते हुए प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ और बांस आधारित सुरक्षित आवास जैसी तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। वहीं, पहले से बने कमजोर मकानों को रेट्रोफिटिंग के जरिये मजबूत करने के तरीके भी बताए गए।
बॉक्स : 75 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत
सीबीआरआई वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों को सोलर-असिस्टेड हाइब्रिड तकनीक की जानकारी भी दी। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. चंदन स्वरूप मीणा ने यह प्रणाली विकसित की है। इसका इस्तेमाल पानी गर्म करने, स्पेस कंडीशनिंग और रसोई की जरूरतों में किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में इससे 75 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत संभव है। बाढ़ के दौरान बिजली आपूर्ति बाधित होने पर यह वैकल्पिक ऊर्जा व्यवस्था के रूप में उपयोगी हो सकती है। यह तकनीक सीएसआईआर-सीबीआरआई रुड़की में विकसित और सत्यापित की गई है तथा हिमाचल प्रदेश के कल्पा और लेह-लद्दाख में भी स्थापित की जा चुकी है।




