Dehradun, 12 September 2026 । घाव भरने की प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक नई स्मार्ट तकनीक विकसित की है। इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मोहाली के सहयोग से तैयार यह स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों से ऊर्जा हासिल कर विद्युत संकेत पैदा करता है। खास बात यह है कि इसके संचालन के लिए बैटरी, तार या किसी बाहरी बिजली स्रोत की आवश्यकता नहीं पड़ती। शोधकर्ताओं के मुताबिक, तकनीक घाव भरने के लिए आवश्यक विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के साथ घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी उपयोगी हो सकती है।
इस तकनीक को 3डी मोनोलिथिक इंटीग्रेटेड डाइपोलर-आयोनिक फाइब्रस आर्किटेक्चरल स्कैफोल्ड नाम दिया गया है। बैंडेज की लचीली संरचना शरीर के हिलने-डुलने, चलने या किसी अंग के खिंचने से होने वाली यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करती है। इसकी एक खास विशेषता यह है कि यह अपनी मूल लंबाई की तुलना में करीब 800 प्रतिशत तक खिंच सकता है, जिससे शरीर के विभिन्न हिस्सों की गतिविधियों के दौरान इसके काम करने की क्षमता बनी रहती है।
प्रयोगशाला परीक्षणों में तकनीक के उत्साहजनक परिणाम सामने आए। नियंत्रण समूह की तुलना में बैंडेज से उपचारित नमूनों में करीब तीन गुना अधिक कोशिका प्रसार और 2.5 गुना अधिक कोशिका प्रवासन दर्ज किया गया। ये दोनों प्रक्रियाएं घाव भरने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
13 से 15 दिन में 90-95 प्रतिशत घाव बंद
तकनीक का परीक्षण पशु मॉडल पर भी किया गया। अध्ययन में उपचारित घावों में 13 से 15 दिनों के भीतर करीब 90 से 95 प्रतिशत तक घाव बंद होने के संकेत मिले। साथ ही नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण और कोलेजन जमाव में भी वृद्धि दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने चलते-फिरते चूहों पर परीक्षण के दौरान पाया कि बैंडेज उनकी प्राकृतिक गतिविधियों से लगातार विद्युत संकेत उत्पन्न कर सकता है।
इसकी टिकाऊ क्षमता जांचने के लिए 500 बार खिंचाव का परीक्षण किया गया। इसके अलावा तीन महीने तक किए गए लंबे परीक्षण में भी बैंडेज का प्रदर्शन स्थिर पाया गया। शोध के परिणाम नैनो एनर्जी शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
हालांकि, यह तकनीक अभी मानव उपचार के लिए प्रमाणित नहीं है। चिकित्सा क्षेत्र में नियमित इस्तेमाल से पहले मानवों पर नैदानिक परीक्षण और आवश्यक नियामकीय सत्यापन जरूरी होगा। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि शरीर की गतिविधियों से ऊर्जा हासिल करने वाली यह तकनीक भविष्य में बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर कम निर्भर स्मार्ट घाव देखभाल प्रणालियों के विकास का आधार बन सकती है।




