Uttarkashi, 13 August 2026। नौगांव नगर पंचायत के वार्ड नंबर सात स्थित सौली गांव में जमीन धंसने का संकट केवल भारी बारिश तक सीमित नहीं है। प्रारंभिक भू-वैज्ञानिक जांच में क्षेत्र की अस्थिर ढलान और तीन से चार मीटर तक मोटी मिट्टी की परत इस खतरे की अहम कड़ी सामने आई है। कई स्थानों पर मिट्टी की इस परत के नीचे ठोस चट्टान का स्पष्ट आधार नहीं मिला। ऐसे में बारिश का पानी मिट्टी के भीतर पहुंचकर ढलान की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। जमीन में बढ़ती दरारों के कारण अब तक करीब 15 परिवारों की छत छिन चुकी है।
जिलाधिकारी उत्तरकाशी के निर्देश पर गठित विशेषज्ञ टीम ने सौली के आपदा प्रभावित क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया। सात और आठ अगस्त को हुई भारी बारिश के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग यमुनोत्री और नौगांव-स्यूरी मोटर मार्ग के बीच जमीन धंसने की स्थिति तेजी से बढ़ी। इसके बाद आसपास के भवनों में दरारें आने लगीं और लोगों में भय का माहौल बन गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्र में तीन से चार मीटर मोटी मिट्टी की परत होने से बारिश का पानी आसानी से जमीन के भीतर प्रवेश कर सकता है। यदि पानी का प्राकृतिक निकास पर्याप्त नहीं हो तो मिट्टी के भीतर नमी और जल-दाब बढ़ने से उसकी स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इससे ढलान के नीचे की ओर खिसकने की संभावना बढ़ जाती है। सौली में सामने आई परिस्थितियों को इसी दृष्टि से गंभीरता से देखा जा रहा है।
ढलान की ओर झुके पेड़ भी दे रहे खतरे का संकेत
निरीक्षण के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग और स्यूरी मार्ग के बीच कई चीड़ के पेड़ ढलान की ओर झुके मिले। विशेषज्ञों के लिए यह जमीन में लंबे समय से चल रही संभावित हलचल का संकेत हो सकता है। हालांकि पेड़ों का झुकाव अकेले भू-धंसाव का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन जब यही स्थिति जमीन की दरारों और भवनों के विस्थापन के साथ दिखाई दे तो यह भू-गतिशीलता का महत्वपूर्ण संकेत बन जाती है।
सड़क कटान की भूमिका भी जांच के दायरे में
ग्रामीणों ने विशेषज्ञ टीम को बताया कि क्षेत्र में भू-धंसाव की समस्या राष्ट्रीय राजमार्ग के कटान के बाद सामने आई और बारिश के दौरान इसमें तेजी आई। इस दावे को भी जांच में शामिल किया गया है। सड़क निर्माण के दौरान पहाड़ की प्राकृतिक ढलान में बदलाव, निचले हिस्से का कटाव, जल निकासी की दिशा बदलना और भार का पुनर्वितरण जैसी परिस्थितियां कमजोर ढलान को और अस्थिर कर सकती हैं। हालांकि सड़क कटान को कारण मानने से पहले तकनीकी अध्ययन जरूरी होगा।
स्थायी समाधान के लिए विस्तृत जांच जरूरी
अब विशेषज्ञ टीम स्थल से जुटाए गए आंकड़ों का तकनीकी परीक्षण करेगी। इसमें मिट्टी की मोटाई और प्रकृति, भूगर्भीय संरचना, जल निकासी, ढलान की स्थिरता और बारिश के बाद जमीन की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाएगा। जरूरत के अनुसार जियोटेक्निकल जांच, ड्रेनेज सर्वे और जमीन की हलचल की नियमित निगरानी भी कराई जा सकती है। विशेषज्ञों की विस्तृत रिपोर्ट के बाद ही यह तय होगा कि सौली को सुरक्षित करने के लिए जल निकासी सुधार, ढलान स्थिरीकरण या अन्य स्थायी तकनीकी उपायों में से किसकी जरूरत है।




