Dehradun, 05 September 2026 । उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रही काली भेड़ अब देश के वैज्ञानिक पशुधन मानचित्र पर दर्ज हो गई है। ‘कोव देबर’ नस्ल को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने स्वदेशी भेड़ की नस्ल के रूप में औपचारिक मान्यता दी है। इसके साथ ही यह उत्तराखंड की पहली ऐसी भेड़ नस्ल बन गई है, जिसे आईसीएआर स्तर पर आधिकारिक नस्ल पहचान मिली है। वैज्ञानिक मान्यता मिलने से अब इस स्थानीय नस्ल के संरक्षण, आनुवंशिक सुधार और वैज्ञानिक प्रजनन के साथ पहाड़ी पशुपालकों की आय बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।
कोव देबर की पहचान केवल उसके विशिष्ट काले रंग से नहीं है। पहाड़ी परिस्थितियों में कम संसाधनों के बावजूद जीवित रहने और स्थानीय वातावरण के अनुरूप ढलने की क्षमता इसकी बड़ी विशेषता है। यह मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय वनस्पतियों पर निर्भर रहती है। यही वजह है कि सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण परिवारों के लिए इसका पालन लंबे समय से पशुधन के साथ अतिरिक्त आय का जरिया रहा है।
इस नस्ल की वैज्ञानिक पहचान और पंजीकरण की प्रक्रिया में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के प्रोफेसर बीएन शाही की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह इस परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने बताया कि आईसीएआर की मान्यता मिलने से कोव देबर के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन के लिए व्यवस्थित तरीके से काम करने का रास्ता साफ हुआ है।
प्रो. शाही के अनुसार अब नस्ल संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार, जर्मप्लाज्म संरक्षण और किसान-केंद्रित पशुधन विकास के क्षेत्र में योजनाबद्ध प्रयास किए जा सकते हैं। इससे नस्ल की विशिष्ट आनुवंशिक विशेषताओं को सुरक्षित रखने के साथ पशुपालकों को बेहतर आर्थिक लाभ दिलाने की दिशा में भी काम संभव होगा।
यानी अब तक पहाड़ की ढलानों, जंगलों और गांवों तक सीमित रही कोव देबर की पहचान वैज्ञानिक दस्तावेजों में दर्ज हो गई है। अब असली चुनौती इस राष्ट्रीय पहचान को नस्ल के संरक्षण और पहाड़ी पशुपालकों की समृद्धि में बदलने की है।
बॉक्स: 43 गांवों में हुआ अध्ययन
कोव देबर की वैज्ञानिक पहचान निर्धारित करने के लिए 43 गांवों के 80 पशुपालकों से जानकारी जुटाई गई। अध्ययन में भेड़ों की शारीरिक विशेषताओं, पालन-पोषण की परिस्थितियों और नस्ल के विशिष्ट गुणों का परीक्षण किया गया। प्राप्त आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर इसे स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधन के रूप में दर्ज कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
बॉक्स: काला शरीर, काले बाल और काली जीभ
कोव देबर का पालन लंबे समय से पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चमोली के पहाड़ी क्षेत्रों में किया जाता रहा है। करीब 1600 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाने वाली यह भेड़ स्थानीय जलवायु के अनुरूप ढल चुकी है। इसका काला शरीर, काले बाल और काली जीभ इसे दूसरी भेड़ नस्लों से अलग विशिष्ट पहचान देते हैं।




