Dehradun, 02 july 2026। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन की चुनौती के बीच पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण विकासखंड के सुकई (बंज्वाड़) गांव के शिक्षक दीनदयाल बिष्ट ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक खेती और वैज्ञानिक सोच से पहाड़ में भी समृद्धि हासिल की जा सकती है। राजकीय इंटर कॉलेज बैंजरो में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता दीनदयाल बिष्ट ने शिक्षण कार्य के साथ सेब और कीवी की व्यावसायिक बागवानी शुरू कर हर वर्ष तीन से चार लाख रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की है। उनकी सफलता अब क्षेत्र के युवाओं और किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान दीनदयाल बिष्ट ने गांव की खाली पड़ी भूमि का बेहतर उपयोग करने का निर्णय लिया। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से सेब और कीवी के पौधे लगाए। शुरुआती वर्षों में मौसम और रखरखाव जैसी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन निरंतर मेहनत, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और विभागीय सहयोग से उनका बगीचा आज लाभदायक उद्यम में बदल चुका है।
उनके बाग में तैयार होने वाले उच्च गुणवत्ता के फल स्थानीय बाजारों में अच्छी कीमत पर बिक रहे हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ी है, बल्कि आसपास के कई युवा और किसान भी फलोत्पादन की ओर आकर्षित हुए हैं। दीनदयाल अब इच्छुक किसानों और युवाओं को बागवानी की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं, जिससे क्षेत्र में स्वरोजगार की नई संभावनाएं विकसित हो रही हैं।
उन्होंने बताया कि यदि वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग किया जाए तो सीमित भूमि से भी बेहतर आय प्राप्त की जा सकती है। उनकी सफलता आत्मनिर्भर उत्तराखंड की अवधारणा को भी मजबूत करती है और यह संदेश देती है कि रोजगार के लिए पलायन ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
बॉक्स: पहाड़ों की जलवायु फलोत्पादन के लिए उपयुक्त
जिला उद्यान अधिकारी मनोरंजन भंडारी ने बताया कि जनपद में सेब, कीवी सहित उच्च मूल्य वाली फल बागवानी को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी परामर्श और विभागीय योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु इन फसलों के लिए बेहद अनुकूल है और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान कम भूमि से भी बेहतर आर्थिक लाभ कमा सकते हैं।
मनरेगा और विभागीय योजनाओं से मिला सहारा
दीनदयाल बिष्ट ने अपने बाग की घेरबाड़ मनरेगा के तहत कराई। कृषि विभाग ने जियोटैंक और पाइपलाइन के माध्यम से सिंचाई व्यवस्था विकसित करने में सहयोग दिया, जबकि उद्यान विभाग ने पौधों के चयन, रोपण, देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन में तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया। विभागीय सहयोग और आधुनिक तकनीकों के कारण उनके बाग की उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता दोनों में लगातार सुधार हुआ है।




