Dehradun, 11 August2026: खेतों में जलाकर नष्ट की जाने वाली पराली और भूसा आने वाले समय में सड़कों की मजबूती का आधार बन सकते हैं। देश में सड़क निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाले पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन यानी कोलतार का विकल्प तैयार करने की दिशा में वैज्ञानिकों ने अहम कदम बढ़ाया है। धान की पराली समेत विभिन्न कृषि अवशेषों और बायोमास कचरे से बायो-बाइंडर तैयार किया जा रहा है, जिसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में बिटुमेन के विकल्प के रूप में या उसके साथ किया जा सकता है।
यह स्वदेशी तकनीक सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर-आईआईपी), देहरादून ने सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और सीएसआईआर-एएमपीआरआई के सहयोग से विकसित की है। तकनीक में कृषि अवशेषों को विशेष प्रक्रिया से संसाधित कर बायो-ऑयल, बायो-बाइंडर, बायोचार और बायोगैस जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इनमें बायो-बाइंडर को सड़क निर्माण के लिए उपयोगी बनाने पर खास जोर दिया जा रहा है।
खेत का कचरा बनेगा कमाई का जरिया
इस तकनीक के बड़े पैमाने पर सफल होने पर इसका असर खेत से लेकर सड़क तक दिखाई दे सकता है। पराली जलाने की घटनाओं में कमी आने से धुआं और वायु प्रदूषण घटाने में मदद मिलेगी। किसानों के लिए पराली और अन्य कृषि अवशेष महज कचरा न रहकर आय का अतिरिक्त स्रोत बन सकते हैं। वहीं, सड़क निर्माण में पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन की जरूरत घटने से देश की आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले समय में पूरी तरह कोलतार हटाकर सिर्फ पराली से सड़कें बनाई जाएंगी। बायो-बाइंडर को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले सड़क की मजबूती, टिकाऊपन, मौसम के प्रभाव और लागत समेत कई मानकों पर व्यापक परीक्षण जरूरी है।
मार्च 2027 तक शुरू होगी राष्ट्रीय परीक्षण प्रयोगशाला
बायो-बाइंडर की गुणवत्ता और सड़क निर्माण में इसकी उपयोगिता की वैज्ञानिक जांच के लिए सीएसआईआर-सीआरआरआई में राष्ट्रीय बायो-बाइंडर परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है। इसके मार्च 2027 तक शुरू होने का लक्ष्य है। यहां अलग-अलग परिस्थितियों में बायो-बाइंडर के प्रदर्शन का परीक्षण किया जाएगा। परीक्षणों में सफलता मिलने पर कृषि अवशेष भविष्य में देश के सड़क निर्माण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल बन सकते हैं।
किसानों को मिलेगा अतिरिक्त आय का अवसर
सीएसआईआर-आईआईपी के निदेशक डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट के अनुसार बायो-बाइंडर तकनीक कृषि और बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग होगा, किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा होंगे और आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
शिलांग से आंध्र प्रदेश तक हो रहा परीक्षण
यह तकनीक अभी केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। सीएसआईआर-सीआरआरआई ने मेघालय में शिलांग के पास राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर करीब 100 मीटर लंबे बायो-बाइंडर सड़क खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन पूरा किया है। इसके बाद आंध्र प्रदेश में पांच किलोमीटर लंबे सड़क निर्माण के माध्यम से तकनीक का आगे परीक्षण किया जा रहा है। इन परीक्षणों के नतीजे यह तय करने में अहम होंगे कि खेतों से निकलने वाले बायोमास को देश की सड़कों में कितने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।




