Dehradun, 11 August 2026। भारत-चीन युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले उत्तराखंड के वीर सपूत राइफलमैन जसवंत सिंह की शौर्यगाथा को अब अरुणाचल प्रदेश के आधिकारिक मानचित्र में भी जगह मिल गई है। तवांग क्षेत्र में स्थित जसवंतगढ़ वार मेमोरियल उन 27 स्थानों में शामिल है, जिनके मानक नाम केंद्र सरकार ने निर्धारित किए हैं। इन नामों को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र में दर्ज किया जाएगा। इसे अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्रों के नाम बदलने की चीन की कोशिशों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार अरुणाचल प्रदेश सरकार से परामर्श के बाद राज्य के 27 स्थानों के नामों को अंतिम रूप दिया गया है। इनमें सीमावर्ती गांव, पर्वतीय दर्रे, झील और ऐतिहासिक महत्व वाले स्थल शामिल हैं। आधिकारिक मानचित्र में इन स्थानों को भारतीय नामों से दर्ज किए जाने से सीमावर्ती क्षेत्रों की भौगोलिक और प्रशासनिक पहचान और स्पष्ट होगी।
चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के लिए अपने नाम जारी करता रहा है। वह पूरे अरुणाचल प्रदेश पर भी दावा करता है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है। भारत उसके इन दावों को लगातार खारिज करता रहा है। ऐसे में भारतीय मानचित्र पर इन स्थानों के आधिकारिक नाम दर्ज करना देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय दावे को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
नए नामों में अपर सुबनसिरी जिले के लोंगजू, माजा और बिसा जैसे रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्र शामिल हैं। इसके साथ ही मैकमोहन लाइन के आसपास स्थित डो ला, रिजा ला और पुकर ला जैसे पर्वतीय दर्रों तथा अंजॉ जिले की सांबो सरोवर जैसी भौगोलिक विशेषताओं को भी मानकीकृत नाम दिए गए हैं।
सीमा की विरासत को भी मिली पहचान
अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में भारत सरकार बुनियादी ढांचे, सड़क और संपर्क सुविधाओं के विस्तार के साथ सीमावर्ती गांवों को मजबूत करने पर भी जोर दे रही है। ऐसे समय में जसवंतगढ़ जैसे स्मारक को आधिकारिक मानचित्र में स्थान मिलना केवल भौगोलिक पहचान का विषय नहीं है। यह उन सैनिकों की विरासत को भी सामने लाता है, जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
नूरानांग के अमर नायक थे जसवंत सिंह
पौड़ी गढ़वाल की चौथान पट्टी के बरयूं गांव में वर्ष 1941 में जन्मे राइफलमैन जसवंत सिंह वर्ष 1960 में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उनकी तैनाती तवांग क्षेत्र में थी। नूरानांग की लड़ाई में उन्होंने अद्भुत साहस का प्रदर्शन करते हुए विषम परिस्थितियों में चीनी सैनिकों का मुकाबला किया। मोर्चे पर उनका अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान आज भी भारतीय सैनिकों के लिए प्रेरणा है।
उनकी वीरता के सम्मान में उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। तवांग में उनकी स्मृति में बनाया गया जसवंतगढ़ वार मेमोरियल आज भारतीय सैन्य इतिहास और सीमा सुरक्षा की गौरवशाली विरासत का प्रतीक है। अब आधिकारिक मानचित्र में इसका नाम दर्ज होना उत्तराखंड के इस वीर सपूत की शौर्यगाथा को देश की भौगोलिक पहचान से भी जोड़ता है।
अरुणाचल के नक्शे में दर्ज देवभूमि का शूरवीर जसवंत
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